पेड़ का दर्द

पर्यावरण दिवस पर भी,

पेड़ हैं विवश।

पेड़ का दर्द

भूमिका 

एक मौन पुकार, जिसे सुनना अभी बाकी है

हम अक्सर पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण की बातें करते हैं, पौधे लगाने के संकल्प लेते हैं, हरियाली के महत्व पर भाषण देते हैं और प्रकृति संरक्षण के संदेश साझा करते हैं। पर क्या हमने कभी उस वृक्ष की मौन पीड़ा को समझने का प्रयास किया है, जो वर्षों तक हमें छाया देता रहा, प्राणवायु देता रहा, पक्षियों का आशियाना बनता रहा और बदले में केवल थोड़ा-सा स्नेह चाहता रहा?

पेड़ केवल लकड़ी नहीं हैं, वे जीवन की निरंतरता के प्रहरी हैं। वे धरती की धड़कन हैं, ऋतुओं की संतुलित चाल हैं और मनुष्य के अस्तित्व के सबसे निःस्वार्थ साथी हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि विकास की अंधी दौड़ में सबसे पहले उन्हीं की बलि चढ़ती है। कटते वृक्षों की नीरव चीख सुनाई नहीं देती, क्योंकि वे मनुष्य की तरह बोल नहीं सकते। किंतु क्या उनकी खामोशी का अर्थ यह है कि उन्हें पीड़ा नहीं होती?

वरिष्ठ साहित्यकार किशोर कुमार धनावत जी की यह काव्य रचना केवल कविता नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनहीनता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। यह रचना हमें चेताती है कि यदि आज भी हमने वृक्षों की व्यथा को नहीं समझा, तो आने वाला समय केवल ताप, त्रासदी और तड़प लेकर आएगा। आइए, इस मार्मिक काव्य-पुकार को महसूस करें—

पेड़ का दर्द

पेड़ भी रोते हैं,

कटने के बाद।

छटपटाते हैं,

निकलती है मवाद।

कौन समझेगा तड़प,

और दर्द उनका।

उस दिन याद करोगे,

जब नहीं मिलेगा तिनका।

गर्म हवाएँ तूफान,

और 'लू' चलेगी।

लोग बाग झुलसेंगे,

तब हाहाकार मचेगी।

सावधान,

आज आपका गला सूखा है,

पेड़ तो बस प्यार का भूखा है।

इसलिए,

पेड़ को संभारें—जीवन को सँवारें


किशोर कुमार धनावत

व्याख्या

यह कविता अत्यंत सरल शब्दों में एक गहरी संवेदना को अभिव्यक्त करती है। कवि ने पेड़ों को मानवीय रूप देकर उनके दर्द को अनुभव कराने का प्रयास किया है। “पेड़ भी रोते हैं” — यह पंक्ति केवल कल्पना नहीं, बल्कि उस सच्चाई का संकेत है कि वृक्ष भी जीवंत अस्तित्व रखते हैं। उनका कटना केवल एक तना गिरना नहीं, बल्कि प्रकृति के एक जीवित अध्याय का समाप्त होना है।

कवि बताते हैं कि जब वृक्षों की संख्या घटेगी, तब मनुष्य को उसकी वास्तविक कीमत समझ आएगी। आज जो वृक्ष हमें सामान्य लगते हैं, वही कल जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता बन जाएंगे। बढ़ती गर्मी, तूफान, सूखा, जल संकट और ‘लू’ का बढ़ता प्रकोप हमें यह अहसास कराएगा कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम कितना भयावह हो सकता है।

कविता की सबसे प्रभावशाली पंक्ति — 

“पेड़ तो बस प्यार का भूखा है” 

मानवता को एक सीधा और सरल संदेश देती है कि वृक्ष हमसे कुछ बड़ा नहीं मांगते, केवल संरक्षण, संवेदनशीलता और प्रेम चाहते हैं।

शिक्षा

यह कविता हमें सिखाती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने की जिम्मेदारी है। वृक्षों को काटने से पहले हमें उनके महत्व को समझना होगा और जितना संभव हो, अधिकाधिक पेड़ लगाने तथा उन्हें संरक्षित करने का संकल्प लेना होगा।

यदि हम प्रकृति को बचाएंगे, तभी प्रकृति हमें बचाएगी। आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, शीतल छांव और सुरक्षित भविष्य देना है, तो हमें आज ही जागना होगा।

याद रखें कि

*पेड़ केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, हमारे जीवन की सांस हैं।

*पेड़ बचेंगे, तभी जीवन बचेगा। 

कल्पनाकार














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