प्यार से बड़ी कोई गूँज नहीं...

प्यार से बड़ी कोई गूँज नहीं...

भूमिका

क्या कभी ऐसा हुआ है कि कोई आवाज़ सुनाई न दे, फिर भी उसका असर भीतर देर तक बना रहे? क्या कभी किसी अपने की कही हुई एक छोटी-सी बात वर्षों बाद भी मन में वैसे ही गूँज उठी हो? आखिर ऐसा क्या है इस “गूँज” में, जो केवल ध्वनि का लौटना भर नहीं, बल्कि स्मृतियों, संवेदनाओं और रिश्तों का जीवंत स्पंदन बन जाती है?

मनुष्य का जीवन केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उन अनकहे एहसासों से भी संचालित होता है, जो समय-समय पर भीतर प्रतिध्वनित होते रहते हैं। कभी माँ की पुकार, कभी बच्चे की किलकारी, कभी किसी प्रिय का स्मरण—ये सब जीवन की ऐसी गूँज हैं जो हमें भीतर से जीवित रखती हैं। वरिष्ठ लेखिका विजया डालमिया जी का यह विचारोत्तेजक लेख “प्यार से बड़ी कोई गूँज नहीं...” इसी आत्मिक प्रतिध्वनि को समझने और महसूस करने का एक सुंदर प्रयास है।

आलेख

एक गूँज कानों में उतरती है,

और एक गूँज कानों से उतरकर सीधे हृदय तक पहुँच जाती है।

कानों में उतरने वाली गूँज अक्सर अपनों की ही होती है—वे अपने, जो हमारे दिल के बेहद करीब होते हैं।

“गूँज”—यह शब्द अपने आप में अत्यंत विशिष्ट है। सामंजस्यपूर्ण लय के साथ किसी आवाज़ का लौटकर आना अपने भीतर एक अनोखा आकर्षण समेटे रहता है। गूँज चाहे अपने नाम की हो या किसी प्रिय के संबोधन की, वह एक कंपन के साथ मन के भीतर प्रवेश कर जाती है।

शायद यही कारण है कि लोग ऐसी जगहों की तलाश करते हैं, जहाँ वे स्वयं को सुन सकें। पर वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमारे भीतर भी एक ऐसी वादी होती है, जहाँ हमारी अपनी गूँज सदैव विद्यमान रहती है।

एक स्त्री जब पहली बार माँ बनती है, तब प्रसव पीड़ा की अनुभूति उसके भीतर मातृत्व की एक स्थायी गूँज छोड़ जाती है। उसी प्रकार बच्चे का हल्का-सा रुदन भी माँ की अचेतन अवस्था में गूँज बनकर उसे सतर्क कर देता है। बच्चों की किलकारियाँ, हर्षोल्लास के क्षण—ये सब स्मृतियों की ऐसी गूँज हैं, जिन्हें हम कभी भी अपने भीतर महसूस कर सकते हैं।

जीवन का एक सुंदर सत्य यह भी है कि हम जो कहते हैं, वही किसी न किसी रूप में लौटकर हमारे पास आता है—चाहे वह शब्द हों या व्यवहार। तो क्यों न हम ऐसे शब्दों की श्रृंखला रचें, जिनकी गूँज केवल हमें ही नहीं, दूसरों को भी सुकून और अपनापन दे?

निस्संदेह, प्यार से बड़ी कोई गूँज नहीं होती। वह दिल और दिमाग में किसी प्रिय के ख्याल की तरह हर पल गुंजायमान रहती है। कई बार जीवन के सबसे सार्थक क्षण वे होते हैं, जहाँ शब्द नहीं होते, आवाज़ नहीं होती—सिर्फ एहसासों की गूँज होती है।

जब प्रेम की पीर हमारे अस्तित्व के हर हिस्से में गूँजने लगे, तब वही प्रेम शाश्वत बन जाता है। शायद वही समय होता है, जब मनुष्य अपने भीतर की सीमाओं को पार कर कुछ असाधारण कर गुजरता है।

तात्पर्य यही है कि कोई भी बात, विचार या कार्य—यदि प्रभावशाली और संवेदनशील ढंग से घटित हो—तो उसकी गूँज समय की सीमाओं को पार कर सदियों तक सुनाई देती रहती है।

सृजक

 
श्रीमती विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
महिला लेखिका प्रकोष्ठ, उलझन सुलझन
हैदराबाद
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति






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