मेरी डायरी से
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भूमिका
प्रकृति केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव करने का अनंत लोक है। जब मन शांत होता है, तब वह रंगों में भी ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करने लगता है। आकाश की लालिमा, इंद्रधनुष की मुस्कान, फूलों की विविधता, पर्वतों का वैभव और ऋतुओं का परिवर्तन—ये सभी उस अदृश्य सृजनकर्ता के मौन हस्ताक्षर हैं, जो बिना बोले अपनी महानता का परिचय देता रहता है।
प्रस्तुत काव्य रचना में कवयित्री प्रमिला त्रिवेदी ने उसी अदृश्य "रंगरेज" अर्थात् परम सृष्टिकर्ता के प्रति विस्मय, श्रद्धा और आत्मसमर्पण का भाव व्यक्त किया है। यह कविता केवल प्रकृति के रंगों का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य को उसकी सीमाओं का बोध कराते हुए उस अनंत सत्ता के प्रति नतमस्तक होने की प्रेरणा देती है।
काव्य रचना
अदृश्य 'रंगरेज'! बता दे
इतने रंग कहाँ से लाया?
नभ से क्षितिज तक मंत्रमुग्ध
करने वाला संसार बसाया।
एक अकेले इंद्रधनुष में
सात रंग के तार पिरोये।
धरती के कण-कण में अनगिन
छवियों वाले रंग समोये।
रंगों के इस महासिंधु का
अथ तो है, पर अंत नहीं है।
जल-थल के इस रोम-रोम में
कह दो कहाँ 'वसन्त' नहीं है?
यह विचित्र संसार रंग का,
यह सौन्दर्य-राशि अद्भुत है।
इस रहस्य की छाया तक को
भी विज्ञान कहाँ छू पाया?
फूलों की घाटी देखी है?
हर फूल अलग-अलग सा,
हर रंग अलग-अलग सा।
कहाँ तक तेरे इस जगत के
आश्चर्य भरे संसार को देखें।
तेरी महानता के गुण तो जीवन भर
भी पूरे नहीं हो सकते।
'नेति-नेति' देवता कहकर हारे,
हमारी तो औकात ही क्या है?
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी
काव्य-व्याख्या
यह कविता प्रकृति के माध्यम से परमात्मा की अनंत सृजनशीलता का स्तुतिगान है। कवयित्री ईश्वर को "अदृश्य रंगरेज" कहकर संबोधित करती हैं। जिस प्रकार एक रंगरेज साधारण वस्त्रों को रंगों से सजा देता है, उसी प्रकार परमात्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि को असंख्य रंगों से अलंकृत कर दिया है।
कविता का आरंभ ही एक जिज्ञासा से होता है—इतने रंग कहाँ से आए? यह प्रश्न उत्तर पाने के लिए नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता की महिमा का स्वीकार करने के लिए है।
इंद्रधनुष के सात रंगों का उल्लेख करते हुए कवयित्री यह बताती हैं कि यदि केवल एक इंद्रधनुष ही इतना मोहक है, तो संपूर्ण धरती पर फैले असंख्य रंगों की कल्पना कितनी अद्भुत होगी। पेड़-पौधे, नदियाँ, पर्वत, पशु-पक्षी, ऋतुएँ और आकाश—सब उसी दिव्य कलाकार की अनुपम कृति हैं।
"रंगों का महासिंधु" एक अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक है। इसका आशय है कि सृष्टि में सौंदर्य और विविधता का कोई अंत नहीं। जल और स्थल का प्रत्येक कण वसंत की चेतना से ओतप्रोत प्रतीत होता है।
कवयित्री आगे विज्ञान की सीमाओं की ओर संकेत करती हैं। विज्ञान प्रकृति के नियमों की व्याख्या तो कर सकता है, परन्तु सौंदर्य की अनुभूति, रंगों की आत्मा और सृजन के अंतिम रहस्य को पूरी तरह नहीं पकड़ सकता। इसलिए वे कहती हैं कि विज्ञान अभी उस रहस्य की छाया तक भी नहीं पहुँच पाया है।
फूलों की घाटी का उदाहरण देकर यह स्पष्ट किया गया है कि एक ही सृष्टिकर्ता ने प्रत्येक फूल को अलग रंग, अलग आकार और अलग सुगंध प्रदान की है। यह विविधता ही प्रकृति का सबसे बड़ा चमत्कार है।
अंतिम पंक्तियों में कवयित्री विनम्र होकर स्वीकार करती हैं कि परमात्मा की महिमा का पूर्ण वर्णन किसी के लिए संभव नहीं। वेदों का प्रसिद्ध वाक्य "नेति-नेति" (यह भी नहीं, वह भी नहीं) इसी सत्य का उद्घोष करता है कि परम सत्य किसी एक परिभाषा में समाहित नहीं हो सकता। जब देवतागण भी उसकी महिमा का पार नहीं पा सके, तब सामान्य मनुष्य का सामर्थ्य कितना सीमित है—यही भाव कविता का उत्कर्ष बन जाता है।
निहित भाव
इस काव्य रचना में अनेक गहन जीवन-मूल्य समाहित हैं—
*प्रकृति में परमात्मा के साक्षात् दर्शन का भाव।
*सृष्टि की विविधता और सौंदर्य के प्रति विस्मय का भाव।
*विनम्रता—मनुष्य कितना भी ज्ञान अर्जित कर ले, वह सृष्टिकर्ता की पूर्ण महिमा का वर्णन नहीं कर सकता।
*विज्ञान और अध्यात्म का संतुलन—विज्ञान आवश्यक है, किन्तु अनुभव और आध्यात्मिक चेतना का अपना स्वतंत्र स्थान है।
*प्रकृति के प्रति कृतज्ञता—प्रत्येक रंग, प्रत्येक पुष्प और प्रत्येक ऋतु ईश्वर का उपहार है।
*नेति-नेति' का दार्शनिक संदेश—परम सत्य अनंत है, इसलिए उसे पूर्णतः शब्दों में बाँधना संभव नहीं।
*अहंकार का विसर्जन—जितना अधिक मनुष्य प्रकृति को समझता है, उतना ही उसे अपनी सीमाओं का बोध होता है।
यह कविता पाठक के भीतर केवल प्रकृति-प्रेम ही नहीं जगाती, बल्कि उसे उस अदृश्य सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा, विनम्रता, कृतज्ञता और आत्मचिंतन के भावों से भी भर देती है। यही इसकी सबसे बड़ी साहित्यिक और आध्यात्मिक उपलब्धि है।
रचनाकार








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