अंतर्तम की आवाज़

अंतर्तम की आवाज़ 

स्वधर्म की ओर एक मौन यात्रा

भूमिका

मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि हमें क्या प्राप्त करना है, बल्कि यह है कि हमें वास्तव में क्या बनना है। बाहरी दुनिया निरंतर हमें दिशा देने का प्रयास करती है—समाज, संबंध, परंपराएँ और परिस्थितियाँ अपने-अपने स्वर में हमें पुकारती रहती हैं। ऐसे में मनुष्य अक्सर स्वयं से दूर हो जाता है।

ओशो द्वारा प्रस्तुत यह चिंतन हमें भीतर उतरने, मौन में स्वयं को सुनने और अपनी अंतरात्मा की उस सूक्ष्म आवाज़ को पहचानने की प्रेरणा देता है, जो हमारे वास्तविक स्वधर्म का मार्ग प्रशस्त करती है। यह केवल आध्यात्मिक विचार नहीं, बल्कि आत्म-खोज की एक साधना है।

अन्तर्वाणी

जल्दी न करें।

एक घंटा तय कर लें स्वधर्म की खोज के लिए। आपको पता नहीं, लेकिन आपकी अंतरात्मा को पता है कि क्या है आपका स्वधर्म। आंख बंद करें। मौन हो जाएं। चुप बैठकर सुनें। मौन, सिर्फ भीतर ध्यान को करके, सुनने की कोशिश करें कि भीतर कोई बोलता है! कोई आवाज !

बहुत-सी आवाजें सुनाई पड़ेंगी। पहचानने में कठिनाई न होगी कि ये बाहर की आवाजें हैं। मित्रों के शब्द याद आएंगे, शत्रुओं के शब्द; दुकान, बाजार, मंदिर, शास्त्र-सब शब्द याद आएंगे। पहचान सकेंगे भलीभांति, बाहर के सुने हुए हैं। छोड़ दें। उन पर ध्यान न दे। और भीतर ! और प्रतीक्षा करते रहें।

अगर तीन महीने कोई सिर्फ एक घंटा चुप बैठकर प्रतीक्षा कर सके धैर्य से, तो उसे भीतर की आवाज का पता चलना शुरू हो जाएगा। और एक बार भीतर का स्वर पकड़ लिया जाए, तो आपको फिर जिंदगी में किसी से सलाह लेने की जरूरत न पड़ेगी। जब भी जरूरत हो, आंख बंद करें और भीतर से सलाह ले लें; पूछ लें भीतर से कि क्या करना है। और स्वधर्म की यात्रा पर आप चल पड़ेंगे।

क्योंकि भीतर से स्वधर्म की ही आवाज आती है। भीतर से कभी परधर्म की आवाज नहीं आती। परधर्म की आवाज सदा बाहर से आती है।”

वक्ता

ओशो

 चिंतन से मिलने वाली सीख

* जीवन के महत्वपूर्ण उत्तर बाहर नहीं, हमारे भीतर छिपे होते हैं।

* मौन और धैर्य आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी हैं।

* बाहरी प्रभावों से मुक्त होकर ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वभाव और कर्तव्य को पहचान सकता है।

* अंतरात्मा की आवाज़ मनुष्य को भ्रम नहीं, सही दिशा देती है।

* आत्मसंवाद की आदत व्यक्ति को आत्मनिर्भर और निर्णयक्षम बनाती है।

* स्वधर्म वही है जो भीतर शांति, संतोष और सत्य का अनुभव कराए।

प्रसारक


पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति









Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा

सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे जिएं - श्री संगीत शर्मा

रात भर एक करवट है माँ - विजया डालमिया (मदर्स डे पर विशेष)