आँसू

आँसू

भूमिका

पलकों से ढुलकने वाली आँसू की बूँदें केवल पानी नहीं होतीं, वे मन की उन अनकही पीड़ाओं की भाषा होती हैं जिन्हें शब्द भी व्यक्त नहीं कर पाते। कई बार हम किसी के चेहरे पर मुस्कान देखते हैं, पर उसके भीतर बह रहे दर्द के सागर को नहीं देख पाते। संवेदनहीनता, अहंकार, स्वार्थ और महत्वाकांक्षाओं की दौड़ में मनुष्य अक्सर यह भूल जाता है कि उसके व्यवहार से किसी का हृदय कितना आहत हो सकता है। प्रस्तुत रचना "आँसू" इसी मानवीय संवेदना के क्षरण और पीड़ा की गहराई को उजागर करती है। यह पाठक को सोचने पर विवश करती है कि जिन आँसुओं को हम साधारण समझ लेते हैं, वे वास्तव में किसी टूटते हुए मन और तड़पती हुई आत्मा की अभिव्यक्ति होते हैं।

काव्य रचना

आए दिन न जाने कितने लोग, कितनों को आँसू देते हैं।

एकांत में या खुले में, रोने को विवश करते हैं।


कोई मोल नहीं शायद उन आँसुओं का,

जो कितनी ही बार उनके कारण बहाए जाते हैं।


क्या मोल होगा आँसुओं का?

पानी ही तो है!

पानी तो बहुत है धरा पर,

फिर ये कैसे कीमती हुए?


इसी कारण कितनी ही आँखें रोती हैं,

पर किसी का दिल नहीं पसीजता उन आँसुओं से।

किसी को दया भी तो नहीं आती।


शायद दया आती, तो वे आँसुओं के कारण न बनते।

बस उनका अभिमान ऊपर रहे,

प्रतिष्ठा दाँव पर न लगे,

उनका दंभ सर्वोच्च रहे,

उनका लोभ पूरा हो,

उनकी महत्वाकांक्षाएँ पूर्ण हों।


फिर इन पानी वाले आँसुओं की क्या कीमत?

आँसू तो बहुत छोटी बात हैं, इन सब मुद्दों के सामने।


ऐसे ही चलते-चलते वे कितनी आँखों में आँसू दे जाते हैं,

जिन्हें अहसास भी नहीं होता

किसी के दिल के रोने का,

किसी के दम घुटने का।


ज़्यादा से ज़्यादा कोई ज़िंदगी से हार जाएगा।

वह कौन-सी इतनी कीमती है यहाँ?

रोज़ कितने ही जन्म लेते हैं और मरते हैं यहाँ।


वे तो पत्थर-दिल हैं,

जिनकी संवेदनाएँ मर चुकी हैं।

वे सोचते हैं— बस आँसू ही तो हैं,

सूख जाएँगे पलकों में कुछ देर बाद।

इससे ज़्यादा क्या होगा?


उन्हें नहीं पता कि जब पलकों से झरते हैं आँसू,

तब बहुत बदतर होती है हालत।

मौत भी छोटी लगती है उससे।


मौत तो आँसुओं का अंत है,

पर आत्मा को रुलाना,

कितनी ही बार मौत के समान होता है।


सुनिता मीना

उपप्राचार्य और स्थानीय संपादिका

उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ

सवाई माधोपुर (राजस्थान)

निहित भाव

यह रचना मानवीय संवेदनाओं के क्षरण, अहंकार, स्वार्थ और दूसरों के दुःख के प्रति उदासीनता पर गहरा प्रहार करती है। कवयित्री बताना चाहती हैं कि आँसू केवल पानी की बूँदें नहीं, बल्कि टूटते हुए हृदय और व्यथित आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। जब किसी व्यक्ति को बार-बार मानसिक पीड़ा पहुँचाई जाती है, तो उसके आँसू उसकी असहायता, वेदना और आंतरिक संघर्ष का प्रतीक बन जाते हैं।

रचना का मूल संदेश यह है कि मनुष्य को अपने व्यवहार के प्रति सजग रहना चाहिए। किसी के मन को आहत करना, उसकी आत्मा को रुलाना, किसी शारीरिक पीड़ा से कहीं अधिक गंभीर होता है। संवेदनशीलता, करुणा और सहानुभूति ही मानवता के वास्तविक गुण हैं। यदि हम दूसरों के आँसुओं का मूल्य समझ लें, तो अनेक दुःख, टूटन और त्रासदियाँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं। यह रचना पाठक को मानवीय संवेदनाओं के महत्व का स्मरण कराती है तथा दूसरों के दुःख को समझने और सम्मान देने की प्रेरणा प्रदान करती है।

सृजक

 
सुनिता मीना
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति










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