......... क्या पुस्तकों का दौर लौटेगा

क्या पुस्तकों का दौर लौटेगा? 

भूमिका

मानव सभ्यता के विकास में पुस्तकों की भूमिका सदैव केंद्रीय रही है। पुस्तकें केवल ज्ञान का भंडार नहीं होतीं, बल्कि वे अनुभव, चिंतन, संस्कृति और सभ्यता की वाहक भी होती हैं। एक समय था जब पुस्तकें व्यक्ति के व्यक्तित्व का हिस्सा हुआ करती थीं। लोग तर्क, विचार और ज्ञान की पुष्टि पुस्तकों के आधार पर करते थे। किंतु तकनीकी युग के विस्तार और डिजिटल माध्यमों की सहज उपलब्धता ने पढ़ने की आदतों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। आज प्रश्न यह उठता है कि क्या पुस्तकों का वह स्वर्णिम दौर फिर लौटेगा? क्या आने वाली पीढ़ियाँ पुनः पुस्तकों के प्रति वैसी ही आत्मीयता विकसित कर पाएंगी जैसी कभी समाज में दिखाई देती थी? प्रस्तुत आलेख इसी विचार के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता है।

पुस्तकों से स्क्रीन तक : बदलता अध्ययन संस्कार

बीस साल पहले तक लोग अक्सर आपस में तर्क-वितर्क करते हुए अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए कह दिया करते थे— *“मुझे बताओ, यह कौन-सी किताब में लिखा है?”* किंतु आज यह वाक्य सुनाई नहीं देता। इसका प्रमुख कारण यह है कि अब जनसमुदाय पुस्तकों का अध्ययन पहले की भाँति नहीं करता, इसलिए संदर्भ भी पुस्तकों के नहीं दिए जाते।

                                  पुस्तक संदर्भ संकेत

विगत दो दशकों में जब से हैंडफोन और स्मार्टफोन का प्रचलन बढ़ा है, तभी से पुस्तकों के पाठक लगातार कम होते गए हैं। यह अवश्य कहा जा सकता है कि आज पुस्तकें ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं, जो कि सत्य है, किंतु उनकी पठनीयता अत्यंत सीमित होती जा रही है। विडंबना यह है कि जब लोग पुस्तकें पढ़ने के शौकीन थे, तब उनकी उपलब्धता इतनी सहज नहीं थी।

                                   ऑन लाइन रीडिंग

उस समय पुस्तकालयों, मित्रों, विद्यार्थियों अथवा डाक द्वारा पुस्तकें मँगाकर पढ़ी जाती थीं। जिज्ञासु पुस्तक-प्रेमी किसी भी प्रकार पुस्तकें प्राप्त कर लेते थे और जहाँ आवश्यकता होती, वहाँ संदर्भ देते हुए कहते— “मैंने फलाँ पुस्तक में इसे पढ़ा है, तुम बताओ तुमने कौन-सी किताब में पढ़ा है?” और जिसने पढ़ा न हो, वह निरुत्तर हो जाता था।

बदलता सामाजिक परिदृश्य और संदर्भों का स्वरूप

आज परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। पुस्तकें अब केवल साहित्यकारों और सीमित पाठक वर्ग की विषय-वस्तु बनती जा रही हैं। यद्यपि पुस्तक प्रकाशन निरंतर हो रहा है, किंतु पाठक वर्ग में कमी स्पष्ट दिखाई देती है।

अब गोष्ठियों, वाद-विवादों और सामान्य वार्तालाप में पुस्तकों के स्थान पर वीडियो के संदर्भ दिए जाते हैं। लोग कहते सुनाई देते हैं—

“मैंने कल एक वीडियो देखी है।”

“मैं वह वीडियो तुम्हें भेजूँगा।”

“फेसबुक पर आज एक नई वीडियो आई है।”

यह परिवर्तन केवल माध्यम का नहीं, बल्कि ज्ञान अर्जन की शैली और सोच का भी परिवर्तन है।

डिजिटल अध्ययन और उसके दुष्प्रभाव

अध्ययन और अध्यापन का पुस्तकों से हटकर डिजिटल माध्यमों की ओर स्थानांतरण कई प्रभाव लेकर आया है। सबसे बड़ा प्रभाव स्मरण शक्ति के क्षरण के रूप में सामने आया है। पुस्तक पढ़ने से मन एकाग्र होता था और जानकारी लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती थी। बचपन में पढ़ी गई बातें वृद्धावस्था तक लोगों को याद रहती थीं।

इसके विपरीत, वीडियो और यूट्यूब के माध्यम से प्राप्त जानकारी अक्सर कुछ घंटों या कुछ दिनों में ही धूमिल हो जाती है। निरंतर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने से मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग और उससे जुड़ी समस्याओं की चर्चा भी बढ़ी है। साथ ही, अत्यधिक डिजिटल निर्भरता से ध्यान भटकने और स्मृति पर प्रभाव पड़ने की चिंता विशेषज्ञ समय-समय पर व्यक्त करते रहे हैं।

दूसरी बड़ी हानि अध्ययनशीलता की प्रवृत्ति में कमी के रूप में दिखाई देती है। जब से हाथों में फोन आया है, तब से घंटों बैठकर पढ़ने और मनन करने की आदतें विशेषकर युवा पीढ़ी में कम होती गई हैं। परिणामस्वरूप गहन अध्ययन का गुण भी सीमित होता प्रतीत होता है।

तीसरा दुष्प्रभाव यह है कि खोजकर पढ़ने और गहराई से समझने की प्रवृत्ति में कमी आई है। विद्यार्थी, शोधार्थी और साहित्यकार भी कई बार फेसबुक, व्हाट्सऐप, यूट्यूब अथवा अन्य डिजिटल मंचों से त्वरित जानकारी जुटाकर कार्य पूर्ण मान लेते हैं, जबकि गंभीर अध्ययन का अपना अलग महत्व है।

अध्ययनशीलता का आदर्श

भारत के महान दार्शनिक और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक बार कहा था— “कितना अच्छा होता यदि मैं आजीवन विद्यार्थी रह पाता।” उनके इस कथन में अध्ययन के प्रति समर्पण और पुस्तकों के प्रति प्रेम स्पष्ट रूप से झलकता है।

वर्तमान समय में सरकारें भी डिजिटल माध्यमों को बढ़ावा दे रही हैं और पेपरलेस व्यवस्था की वकालत की जा रही है। दूसरी ओर, पर्यावरणविदों का मत है कि कागज़ के अत्यधिक उपयोग से वृक्षों पर दबाव बढ़ता है। ऐसे में संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

यदि प्रत्येक पुस्तक-प्रेमी अपने जीवन में कम से कम एक वृक्ष लगाए और पुस्तकें स्वयं पढ़ने के बाद दूसरों तक पहुँचाए, तो ज्ञान और प्रकृति— दोनों की रक्षा संभव हो सकती है।

आशा की किरण 

क्या लौटेगा पुस्तकों का स्वर्णिम समय?

पिछले कुछ समय से समाज में फोन-कल्चर के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। धीरे-धीरे जनमानस सोशल मीडिया के अति प्रयोग से होने वाली समस्याओं को समझने लगा है। दूसरी ओर, साहित्यकारों के नित नए प्रकाशन यह संकेत भी देते हैं कि पुस्तकों के प्रति रुचि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

यही कारण है कि आशा की किरण दिखाई देती है कि पुस्तकों का दौर पुनः लौट सकता है। यदि ऐसा शीघ्र होता है तो यह भावी पीढ़ी के मानसिक, बौद्धिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।

शिक्षा

यह आलेख हमें शिक्षा देता है कि तकनीक उपयोगी है, किंतु पुस्तकों का स्थान कभी पूर्णतः नहीं ले सकती। डिजिटल माध्यम त्वरित जानकारी दे सकते हैं, परंतु गहन चिंतन, स्थायी ज्ञान और अध्ययनशीलता का संस्कार पुस्तकें ही विकसित करती हैं। इसलिए हमें तकनीक और पुस्तकों के बीच संतुलन बनाते हुए पढ़ने की आदत को पुनर्जीवित करना चाहिए, ताकि ज्ञान, स्मरण शक्ति और चिंतनशील समाज का निर्माण संभव हो सके।

सृजक

संगीत शर्मा

शुभाकांक्षी

उलझन सुलझन, मेरठ (उ प्र) 

पाठ्य उन्नयन







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