दरिंदगी की हदें
दरिंदगी की हदें
भूमिका
समाज की सभ्यता का वास्तविक मापदंड यह नहीं कि उसने कितनी ऊँची इमारतें खड़ी की हैं, बल्कि यह है कि वह अपने सबसे कमजोर और असहाय नागरिक को कितना सुरक्षित रख पाता है। जब मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटनाएँ बार-बार सामने आती हैं, तब केवल अपराधी ही नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की धीमी गति और सामाजिक संवेदनहीनता भी कठघरे में खड़ी दिखाई देती है।
प्रस्तुत काव्य रचना "दरिंदगी की हदें" ऐसे ही ज्वलंत प्रश्नों को स्वर देती है। यह कविता केवल अपराध की नृशंसता का चित्रण नहीं करती, बल्कि न्याय में विलंब, पीड़ित की पीड़ा और समाज में बढ़ते आक्रोश को भी अभिव्यक्ति प्रदान करती है। रचनाकार का उद्देश्य हिंसा का महिमामंडन नहीं, बल्कि यह चेतावनी देना है कि यदि अपराधों पर त्वरित और प्रभावी न्याय सुनिश्चित नहीं होगा, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ता जाएगा और समाज का विश्वास न्याय व्यवस्था से डगमगाने लगेगा।
काव्य रचना
दरिंदगी की हदें
दरिंदों ने पार कर दीं
दरिंदगी की सारी हदें,
इंसाफ की राह में फिर भी
मुकदमे लंबे चलते रहे।
वकीलों की दलीलों में,
गवाहों के बयानों में,
तारीख पर तारीख मिलती रही,
फैसले टलते रहे बहानों में।
जब न्याय में देरी होती है,
तो अपराधी का साहस बढ़ता है,
हर बार कोई नई घटना का
दर्दनाक समाचार मिलता है।
कोई कहता फांसी दो,
कोई कहता कठोर दंड मिले,
दण्ड प्रक्रिया हो ऐसी
अपराधों का जल्द ही अंत हो।
अपराध साधारण नहीं था,
क्यों हो साधारण सजा,
हाथ-पैर को काटकर
सड़क पर छोड़ दो खुला।
तड़पते-छटपटाते शरीर को
हर कोई देखे,
ऐसी दरिंदगी करने से पहले
सौ बार डरे-सोचे।
रचनाकार
सुषमा दामोदर लाहोटी 'पिंकी'
बेल्लमपल्ली (तेलंगाना)
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति






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