झूमती... झूलती... बरसती यादें सावन की

झूमती... झूलती... बरसती यादें सावन की

भूमिका

सावन केवल ऋतु नहीं, भावनाओं का उत्सव है। यह वह समय है जब बादलों की गूँज, वर्षा की रिमझिम, झूलों की मस्ती, मेहंदी की महक और रिश्तों की आत्मीयता मिलकर जीवन को एक नई ताजगी से भर देती है। यह महीना हमें केवल प्रकृति की हरियाली से नहीं जोड़ता, बल्कि स्मृतियों की उन गलियों तक भी ले जाता है जहाँ बचपन की निश्छल हँसी, मायके का अपनापन, सखियों का साथ और परिवार का स्नेह आज भी जीवित है। प्रस्तुत सामयिक भाव केवल सावन का वर्णन नहीं करता, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक संबंधों और मानवीय संवेदनाओं के उस अमूल्य संसार को पुनर्जीवित करता है, जिसे आधुनिक जीवन की भागदौड़ धीरे-धीरे हमसे दूर करती जा रही है।


सामयिक भाव

झूमता मौसम, मस्त महीना—यह सुनते ही सबसे पहले सावन की याद आती है। लेकिन सावन कभी अकेला नहीं आता। वह अपने साथ झूलों की मस्ती, सजनी का श्रृंगार, बारिश की रिमझिम फुहार और अनगिनत भावनात्मक संदेश लेकर आता है।



सावन की घटाएँ छाते ही रक्षाबंधन का पर्व हर नारी के मन को अपने मायके की गलियों और बीते हुए बचपन की ओर ले जाता है। बेटियाँ आँगन की चिड़िया होती हैं, लेकिन जैसे ही सावन आता है, राखी का त्योहार उन्हें बाबुल के आँगन की सैर अवश्य करवा देता है। वर्षा की बौछारें केवल धरती को ही नहीं, यादों को भी हरा-भरा कर देती हैं। हर बेटी को माँ का आँचल, भाई की मनुहार और बाबुल का दुलार मानो झूला बनकर फिर से झुलाने लगता है। जिस आँगन से वह नए रिश्तों की मेहंदी रचाकर विदा हुई थी, उसी आँगन की सौंधी-सौंधी महक उसे हर सावन पुकारती है। सावन की हर बूँद केवल मिट्टी में ही नहीं, मन में भी रिश्तों के बीज बोती जाती है। तभी तो कहा जाता है—सावन जैसा कोई महीना नहीं।

यादों की पगडंडी अक्सर अमराइयों की खुशबू पर जाकर ठहर जाती है। स्मरण हो आते हैं वे झूले, जो सावन और तीज के बहाने मन के अरमानों को नई उड़ान देते थे। वह स्थान, जहाँ कच्चे आमों और फूलों की सुगंध से पूरी अमराई महक उठती थी। मेहंदी से रचे हाथ, खनकती चूड़ियाँ, पैरों की पायल और होठों पर मस्ती भरे गीत—सब मिलकर वातावरण को उत्सवमय बना देते थे। समझ ही नहीं आता था कि शोर हवाएँ मचा रही हैं या झूलों की मस्ती गीत गा रही है।

कैरी खाते हुए झूला झूलने का आनंद खट्टे-मीठे चटकारों के साथ और भी बढ़ जाता था। फिर प्रतियोगिता भी होती—किसका झूला सबसे ऊँचा जाएगा, कौन सबसे अधिक देर तक झूलेगा। यह सब बालमन को नए उत्साह और उमंग से भर देता था। अल्हड़पन से भरी हँसी-ठिठोली, सखियों का साथ और झूलों की मस्ती जीवन में जिंदादिली का संचार कर देती थी।

रिमझिम फुहार हो और दिल में किसी का प्यार—तो वह किसी त्योहार से कम नहीं होता। किसी ने कितनी सुंदर पंक्तियाँ कही हैं—

"आम के पेड़ पर झूला तेरी बाँहों-सा हो,
चिड़िया, कौवा, कितने ही परिंदों का आशियाना हो।"

प्रकृति के साथ जीना अपने आप में कितना सुंदर अनुभव होता है, यह हमने अपने बचपन में महसूस किया है। सावन के आगमन पर कोयल और पपीहे की पुकार, पक्षियों का मधुर कलरव और हरियाली से लहलहाती धरती—मानो समूची प्रकृति अपने-अपने ढंग से इस ऋतु का स्वागत कर रही होती है। इसी कारण इसे हरियाला सावन भी कहा जाता है।

बचपन की स्मृतियों में झूला झूलना मानो फिर से बचपन में लौट जाना है—वह मासूम, चंचल और निश्छल समय। रेल से यात्रा करते हुए आम के पेड़ों पर दृष्टि पड़ते ही मुँह में पानी आ जाता था। खेतों की हरियाली, आम की अमराइयाँ और घर के आँगन तक प्रकृति का सहज विस्तार दिखाई देता था। घर के आँगन में आम के पेड़ों के बीच रस्सियों पर चादर या टायर बाँधकर झूला झूलने का आनंद आज भी मन को रोमांचित कर देता है।

आज न वे झूले रहे, न वे गीत। क्योंकि अब न किसी के पास समय है, न वैसी सहजता और सुविधा। शायद हमें इसका एहसास भी नहीं कि आधुनिकता की दौड़ में हमने अपने भावों का कितना सुंदर संसार खो दिया है। जबकि सच यह है कि उन पलों को जीना हर किसी को अच्छा लगता था।

वास्तव में, सौंदर्य, श्रृंगार, प्रेम और आत्मीयता की अभिव्यक्ति कराने ही सावन आता है। तभी तो किसी कवि ने कहा है—

"...तुम्हें गीतों में ढालूँगा, सावन को आने दो।"

तो क्यों न हम भी इस भागदौड़ भरी जिंदगी से एक दिन चुरा लें?

फिर से मिलकर झूलों पर वही उड़ान भर लें।
मेहंदी रचे हाथों से अपने प्रिय का निहार करें।
सावन के गीत गाकर मस्ती भरी फुहारों को पुकार लें।
एक बार फिर माँ के आँगन में उसी निश्छल अंदाज़ में दौड़ लगा लें।
चलो, इस बार फिर यादों की अमराई में चलते हैं;
सखियों को बुलाकर पुराने गीत गुनगुना लें।

— विजया डालमिया
(संपादक, मेरी निहारिका)


भारतीय संस्कृति और रचना में निहित भाव

विजया डालमिया की यह रचना भारतीय जीवन-दर्शन, पारिवारिक मूल्यों और प्रकृति-प्रेम का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करती है। इसमें सावन केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति बनकर सामने आता है।

इस रचना का सबसे प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष परिवार और रिश्तों की आत्मीयता है। रक्षाबंधन, मायके की स्मृतियाँ, माँ का वात्सल्य, पिता का स्नेह और भाई-बहन का प्रेम—ये सभी भारतीय परिवार व्यवस्था की आत्मा हैं। लेखिका ने इन संबंधों को वर्षा की बूँदों की तरह जीवनदायी और मन को सींचने वाला बताया है।

दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष प्रकृति के साथ भारतीय जीवन का सह-अस्तित्व है। आम की अमराइयाँ, झूले, मेहंदी, कोयल, पपीहा, वर्षा और हरियाली—ये सभी भारतीय लोकजीवन के ऐसे प्रतीक हैं जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध को व्यक्त करते हैं। भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति को पूजनीय मानती रही है और यह रचना उसी परंपरा की सशक्त अभिव्यक्ति है।

रचना का तीसरा भाव लोक-संस्कृति और सामूहिक जीवन है। तीज, झूले, लोकगीत, सखियों का साथ और उत्सव की सामूहिकता यह संदेश देते हैं कि भारतीय त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और भावनात्मक निकटता के उत्सव हैं।

साथ ही, लेखिका आधुनिक जीवन की व्यस्तता पर एक मार्मिक प्रश्न भी उठाती हैं। तकनीकी सुविधाओं और भागदौड़ के बीच हमने समय, संवेदनाएँ और आत्मीय रिश्तों के साथ बिताए जाने वाले वे अमूल्य क्षण कहीं पीछे छोड़ दिए हैं। यह रचना हमें स्मरण कराती है कि विकास तभी सार्थक है जब वह हमारी सांस्कृतिक जड़ों और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखे।

अंततः, यह रचना पाठकों को केवल अतीत की स्मृतियों में नहीं ले जाती, बल्कि उन्हें वर्तमान में भी अपने परिवार, प्रकृति और संस्कृति के साथ पुनः जुड़ने की प्रेरणा देती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है और यही इसका स्थायी संदेश भी।


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