गायब कौन है? - सरोज प्रसाद राय
गायब कौन है?
परिचय
यह कविता समकालीन समाज की विडंबनाओं पर गहरी दृष्टि डालती है। इसमें केवल समस्याओं का चित्रण नहीं, बल्कि अंत में आशा, आत्ममंथन और परिवर्तन का मार्ग भी प्रस्तुत किया गया है। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। यदि इसे थोड़ा और साहित्यिक कसाव और लय के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो इसका प्रभाव और भी व्यापक हो सकता है।
भूमिका
आज का युग अभूतपूर्व भौतिक प्रगति का युग है। विज्ञान, तकनीक और संसाधनों ने मानव जीवन को पहले से कहीं अधिक सुविधाजनक बना दिया है, फिर भी मनुष्य के भीतर एक अनकहा खालीपन बढ़ता जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी उपलब्धियाँ बढ़ी हैं, परंतु मानवीय संवेदनाएँ, विश्वास, ईमानदारी और आत्मीयता धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं।
प्रस्तुत कविता "गायब कौन है?" इसी गंभीर प्रश्न को उठाती है। कवि यह स्पष्ट करता है कि वास्तव में गायब धन या साधन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर का मनुष्य है। कविता समाज की विसंगतियों का सजीव चित्रण करते हुए अंततः निराशा नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन और आशा का संदेश देती है।
काव्य-रचना
गायब कौन है?
गायब केवल धन-दौलत नहीं,
कुछ और भी खोता जा रहा है।
हर नई सुबह के संग-संग,
इंसान ही इंसान से दूर होता जा रहा है।
गायब है आँखों का विश्वास,
होठों की सच्ची मुस्कान।
भीड़ बहुत है इस दुनिया में,
पर कम होता जा रहा इंसान।
गायब है रिश्तों की गर्माहट,
माँ की चौखट का वह मान।
स्वार्थों की ऊँची दीवारों में,
कैद हुआ हर एक अरमान।
गायब है न्याय की निर्भीकता,
ईमान कहीं चुप बैठा है।
झूठ सजे सिंहासन पर,
सच कटघरे में ऐंठा है।
गायब है प्रकृति की हरियाली,
नदियों का निर्मल गान।
लाभ की अंधी दौड़ में,
घायल है अपना ही जहान।
गायब है शिक्षा का उद्देश्य,
ज्ञान नहीं, बस अंक मिले।
चरित्र की रोशनी बुझती जाए,
डिग्रियों के ढेर मिले।
कहीं सवालों के उत्तर गायब,
कहीं उत्तरदायित्व लापता।
कहीं संवेदना दम तोड़ रही,
कहीं मौन खड़ा है लोकतंत्र।
पर सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
क्या सचमुच सब कुछ गायब है?
नहीं...
जब तक एक भी मन सत्य के लिए धड़कता है,
जब तक एक भी हाथ अन्याय के विरुद्ध उठता है,
जब तक एक भी दीप अंधेरों से लड़ता है,
तब तक उम्मीद ज़िंदा है।
आओ, दूसरों में कमियाँ खोजने से पहले,
अपने भीतर खोए हुए इंसान को ढूँढ़ें।
क्योंकि देश तभी बदलेगा,
जब हम स्वयं बदलेंगे।
✍️ सरोज प्रसाद राय
विस्तृत व्याख्या
कवि सबसे पहले यह स्थापित करता है कि समाज में केवल आर्थिक असमानता या धन का अभाव ही समस्या नहीं है। वास्तविक संकट मानवीय मूल्यों के क्षरण का है। मनुष्य भौतिक रूप से निकट होते हुए भी भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से दूर होता जा रहा है।
दूसरे चरण में कवि विश्वास और मुस्कान जैसे मानवीय गुणों के लुप्त होने की ओर संकेत करता है। आज लोगों की संख्या बढ़ रही है, परंतु सच्चे अर्थों में "इंसानियत" घटती जा रही है। यह पंक्तियाँ आधुनिक सामाजिक जीवन की कृत्रिमता को उजागर करती हैं।
इसके बाद पारिवारिक संबंधों का चित्र सामने आता है। माँ के आँगन का सम्मान, रिश्तों की ऊष्मा और अपनापन स्वार्थ की दीवारों में कैद होकर रह गए हैं। यह केवल परिवार की नहीं, सम्पूर्ण सामाजिक संरचना की चिंता है।
कवि न्याय व्यवस्था और सामाजिक नैतिकता पर भी तीखा प्रहार करता है। ईमानदारी मौन है, झूठ प्रतिष्ठित है और सत्य को कठघरे में खड़ा होना पड़ रहा है। यह व्यवस्था और समाज दोनों पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।
प्रकृति के संदर्भ में कविता पर्यावरणीय संकट को रेखांकित करती है। हरियाली, स्वच्छ नदियाँ और प्राकृतिक संतुलन मानव के असीमित लाभ-लोभ की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। विकास और विनाश के बीच संतुलन खो गया है।
शिक्षा पर व्यक्त विचार अत्यंत मार्मिक हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक या डिग्रियाँ अर्जित करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और ज्ञान का विकास है। जब शिक्षा से संस्कार अलग हो जाते हैं, तब समाज योग्य तो बनता है, किन्तु श्रेष्ठ नहीं।
अंतिम सामाजिक चित्र में उत्तरदायित्व, संवेदना और लोकतांत्रिक चेतना के क्षीण होने की चिंता व्यक्त की गई है। प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, जिम्मेदारियाँ निभाई नहीं जातीं और अन्याय के सामने समाज का मौन लोकतंत्र की आत्मा को आहत करता है।
किन्तु कविता का सबसे सुंदर पक्ष इसका आशावाद है। कवि निराशा में डूबने के स्थान पर विश्वास जगाता है कि जब तक सत्य के लिए धड़कने वाले हृदय, अन्याय के विरुद्ध उठने वाले हाथ और अंधकार से लड़ने वाले दीप मौजूद हैं, तब तक समाज का पुनर्निर्माण संभव है।
अंततः कवि समाधान भी देता है—परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करनी होगी। दूसरों की कमियाँ गिनाने से पहले अपने भीतर के खोए हुए मनुष्य को खोजने का आह्वान ही कविता का मूल संदेश है।
निहित भाव
* मानवीय मूल्यों का क्षरण ही आज की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है।
* विश्वास, संवेदना और आत्मीयता किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला हैं।
* न्याय, सत्य और ईमानदारी की रक्षा प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
* प्रकृति का संरक्षण मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है।
* शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य चरित्र, विवेक और मानवीय चेतना का विकास है।
* लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि जागरूक और उत्तरदायी नागरिकों से जीवित रहता है।
* सामाजिक परिवर्तन का आरंभ व्यक्ति के आत्मपरिवर्तन से होता है।
* आशा, सत्य और संघर्ष की एक छोटी-सी ज्योति भी अंधकार को चुनौती देने के लिए पर्याप्त होती है।
समापन
"गायब कौन है?" केवल एक कविता नहीं, बल्कि हमारे समय का आत्मदर्पण है। यह हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि यदि समाज से विश्वास, संवेदना, सत्य, न्याय और मानवता लुप्त हो जाएँ, तो भौतिक समृद्धि भी अर्थहीन हो जाती है। कवि का संदेश अत्यंत स्पष्ट और प्रेरणादायी है—देश और समाज के परिवर्तन की शुरुआत किसी और से नहीं, स्वयं से होती है। यही इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति और इसकी स्थायी प्रासंगिकता है।
रचयिता
सरोज प्रसाद राय
जयपुर (राजस्थान)
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति









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