✈ कारगिल ✈ - सुषमा अग्रवाल

✈ कारगिल ✈

भूमिका

कारगिल केवल भारत के मानचित्र पर अंकित एक पर्वतीय क्षेत्र का नाम नहीं है, बल्कि यह साहस, राष्ट्रप्रेम, त्याग और अदम्य वीरता का जीवंत प्रतीक है। वर्ष 1999 का कारगिल युद्ध भारतीय सैनिकों के अद्वितीय शौर्य और बलिदान की वह अमर गाथा है, जिसने सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बाँध दिया। इस युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय सैनिक अपने परिवार, सुख-सुविधाओं और व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र की रक्षा को सर्वोच्च धर्म मानते हैं।

प्रस्तुत काव्य-रचना में एक सैनिक के जीवन के विविध भावों का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है। इसमें माँ का वात्सल्य, बहन का स्नेह, पत्नी का प्रेम और परिवार की आकांक्षाओं के बीच मातृभूमि के प्रति सैनिक के सर्वोच्च समर्पण को भावपूर्ण शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है। साथ ही युद्ध की विभीषिका और शांति की आवश्यकता का सशक्त संदेश भी इस कविता का महत्वपूर्ण पक्ष है।

काव्य रचना

माँ की गोद में छुपा हुआ था, वो तो था इक माँ का दिल,

आन पड़ी तो माँ फिर बोली, जा बेटा तू कारगिल...


मिला संदेशा बहना का, आना भैया राखी पर,

इसी राखी की लाज को रखने, जा पहुँचा वो कारगिल...


पाती पाकर प्रियतमा की, मचल रहा था उसका दिल,

आया बुलावा मातृभूमि का, तो वो सीधे पहुँचा कारगिल...


किये सोलह सिंगार सजनिया, बाट देख रही साजन की,

भारत माँ का कर्ज चुकाने, साजन पहुँचा कारगिल...


किये न्योछावर हमने प्राण, बेटे, भाई, साजन के,

तब जाकर के हमने पाया, भारत का दिल कारगिल...


बहनों से बिछुड़े हैं भाई, सुहागिनों के मिट गये सुहाग,

तेरे इस वहशीपन से, बुझ गये कितने घरों के चिराग...

देख-देख कर शहीदों की चिताएँ, बुझती क्यों नहीं तेरे जिगर की आग...


अब तो होश में आ जा - अमन के दुश्मन,

क्यों उजाड़ने में लगा है - हमारा ये चमन,

होश लगा देंगे - ठिकाने में तेरे,

उठाते हैं आज, हम सब ये कसम,

ये वतन है हमारा और हम हैं वतन के,


खाते हैं आज...

हिंदुस्तान की कसम

हिंदुस्तान की कसम...✈✈✈

रचनाकार

सुषमा अग्रवाल, नागपुर (महाराष्ट्र)

विस्तृत व्याख्या

यह कविता कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि में भारतीय सैनिक के जीवन, उसके त्याग और राष्ट्रभक्ति का अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। कवयित्री ने सैनिक को केवल एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक पुत्र, भाई, पति और परिवार के अभिन्न सदस्य के रूप में चित्रित किया है।

कविता का आरम्भ माँ के वात्सल्य से होता है। माँ अपने पुत्र को स्नेह से सीने से लगाए रखती है, किन्तु जब मातृभूमि संकट में पड़ती है, तो वही माँ अपने हृदय पर पत्थर रखकर बेटे को कारगिल की रणभूमि में भेज देती है। यह भारतीय मातृत्व के त्याग और राष्ट्रधर्म की सर्वोच्च भावना का प्रतीक है।

दूसरे पद में बहन के पवित्र स्नेह का चित्रण है। राखी का पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है, किन्तु सैनिक अपनी बहन के पास जाने के स्थान पर देश की सीमाओं की रक्षा को प्राथमिकता देता है। वास्तव में वह अपनी बहन ही नहीं, सम्पूर्ण भारत की असंख्य बहनों की रक्षा के लिए सीमा पर पहुँचता है।

तीसरे और चौथे पद में पति-पत्नी के प्रेम का संवेदनशील चित्र है। प्रियतम का पत्र सैनिक के मन में भावनाएँ जगाता है और पत्नी सोलह श्रृंगार कर उसके लौटने की प्रतीक्षा करती है। किन्तु मातृभूमि का आह्वान व्यक्तिगत प्रेम पर भारी पड़ता है और सैनिक राष्ट्ररक्षा के लिए कारगिल की ओर प्रस्थान कर जाता है। यहाँ राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित किया गया है।

इसके पश्चात कवयित्री शहीदों के बलिदान का स्मरण करती हैं। वे बताती हैं कि कारगिल की विजय केवल सैनिकों की वीरता से नहीं, बल्कि उन परिवारों के अमूल्य त्याग से संभव हुई, जिन्होंने अपने बेटे, भाई और पति देश के लिए समर्पित कर दिए। इसलिए कारगिल भारत के आत्मसम्मान, स्वाभिमान और गौरव का प्रतीक बन गया।

कविता का अगला भाग युद्ध की विभीषिका को सामने लाता है। युद्ध केवल सैनिकों की शहादत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह अनगिनत परिवारों के जीवन में स्थायी पीड़ा छोड़ जाता है। बहनों के भाई बिछुड़ जाते हैं, सुहागिनों का सुहाग उजड़ जाता है और असंख्य घरों के दीपक बुझ जाते हैं। कवयित्री आक्रामक मानसिकता और हिंसा पर तीखा प्रश्न उठाती हैं कि इतनी विनाशलीला देखने के बाद भी युद्ध की आग क्यों नहीं बुझती।

अंतिम पंक्तियों में कविता राष्ट्रीय संकल्प का स्वर धारण कर लेती है। कवयित्री शांति का संदेश देती हैं, किन्तु साथ ही यह भी स्पष्ट करती हैं कि यदि कोई राष्ट्र भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देगा, तो पूरा देश एकजुट होकर उसका सामना करेगा। "हिंदुस्तान की कसम" केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि राष्ट्र की रक्षा के प्रति प्रत्येक भारतीय की अटूट प्रतिबद्धता का घोष है।

यह कविता वीर रस, करुण रस और शांति के संदेश का अत्यंत प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करती है। इसमें सैनिक के व्यक्तिगत जीवन और राष्ट्रीय दायित्व के बीच के संघर्ष को अत्यंत सहज और हृदयस्पर्शी ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।

नैतिक भाव

इस काव्य का मूल संदेश यह है कि राष्ट्र सर्वोपरि है।

परिवार, प्रेम और व्यक्तिगत सुख जीवन के अमूल्य पक्ष हैं, किन्तु जब राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न सामने आता है, तब एक सच्चा नागरिक और सैनिक अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देता है।

साथ ही यह कविता हमें यह भी सिखाती है कि युद्ध कभी उत्सव नहीं होता; उसकी सबसे बड़ी कीमत सैनिकों और उनके परिवारों को चुकानी पड़ती है। इसलिए शांति, संवाद और मानवता का मार्ग ही विश्व का वास्तविक पथ है। किंतु यदि मातृभूमि की अस्मिता पर आंच आए, तो प्रत्येक नागरिक को सैनिकों की भाँति साहस, एकता और राष्ट्रभक्ति के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

कारगिल की अमर गाथा हमें स्मरण कराती है कि राष्ट्र की स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान उन अनगिनत वीरों के बलिदान का परिणाम है, जिनके प्रति कृतज्ञ रहना और उनके आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।

सूचना स्रोत

सुषमा जी अग्रवाल एड. 

नागपुर (महाराष्ट्र) 



Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा

सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे जिएं - श्री संगीत शर्मा

रात भर एक करवट है माँ - विजया डालमिया (मदर्स डे पर विशेष)