“जो सुख किसी के आँसुओं पर खड़ा हो, वह अंततः दुःख का ही बीज बनता है”
“जो सुख किसी के आँसुओं पर खड़ा हो, वह अंततः दुःख का ही बीज बनता है”
उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत करुणामयी, आत्मदर्शी और धर्मबोध से परिपूर्ण प्रतीत होती है। वे जीवन के उन असंख्य प्रसंगों को देख रहे होते हैं जहाँ लोग अपने लाभ, प्रतिष्ठा या सुविधा के लिए दूसरों का अहित कर देते हैं और उसे अपनी सफलता मान बैठते हैं। गुरुजी जानते हैं कि संसार का न्याय कभी देर से हो सकता है, किंतु अंतरात्मा का न्याय तत्काल आरंभ हो जाता है। इसलिए वे भय किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस कर्म से करने की प्रेरणा देते हैं जो किसी और के दुःख पर आधारित हो।
मानो वे अपने शिष्यों से कह रहे हों—
“यदि तुम्हारी प्रसन्नता किसी दूसरे के दुःख से जन्म ले रही है, तो सावधान हो जाओ। क्योंकि प्रकृति के नियम बड़े सूक्ष्म हैं। जो पीड़ा तुम किसी और के जीवन में बोओगे, वही किसी न किसी रूप में तुम्हारी चेतना में लौटकर अवश्य आएगी। ईश्वर दंड देने में जल्दी नहीं करता, लेकिन कर्म का लेखा कभी अधूरा नहीं छोड़ता।”
वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक व्यापारी ने अधिक लाभ कमाने के लिए अपने साथी व्यापारी को छलपूर्वक बड़ा आर्थिक नुकसान पहुँचा दिया। कुछ समय तक वह अपनी सफलता का उत्सव मनाता रहा। नगर में उसकी संपत्ति और वैभव की चर्चा होने लगी। पर धीरे-धीरे उसके अपने कर्मचारी उस पर विश्वास खोने लगे। उसके परिवार में भी अविश्वास पनपने लगा। एक दिन उसका पुत्र बोला— “पिताजी, यदि आपने अपने सबसे निकट के साथी के साथ छल किया, तो हमें कैसे विश्वास हो कि एक दिन हमारे साथ नहीं करेंगे?” व्यापारी के हाथ से सब कुछ छूटने लगा। गुरुजी मुस्कुराकर कहते हैं— “जिस सुख की नींव विश्वासघात पर रखी जाती है, उसकी दीवारें अधिक समय तक खड़ी नहीं रहतीं।”
फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक वन में दो वृक्ष साथ-साथ खड़े थे। पहला वृक्ष सूर्य का पूरा प्रकाश पाने के लिए अपनी शाखाएँ इस प्रकार फैलाता गया कि उसने छोटे पौधों तक धूप पहुँचने ही नहीं दी। कुछ वर्षों तक वह बहुत विशाल और हरा-भरा दिखाई दिया। किंतु जब प्रचंड आँधी आई, तो जिन छोटे पौधों को उसने कभी बढ़ने नहीं दिया था, वे उसकी जड़ों को संभालने के लिए वहाँ थे ही नहीं। वह अकेला वृक्ष धराशायी हो गया। दूसरी ओर, वह वृक्ष जिसने अपने आसपास भी जीवन को फलने-फूलने दिया था, उसकी जड़ों ने पूरे वन से शक्ति पाई और वह सुरक्षित खड़ा रहा। गुरुजी समझाते हैं— “जो केवल अपना सुख चाहता है, वह अंततः अकेला रह जाता है। जो दूसरों के सुख में अपना सुख खोजता है, वही स्थायी आनंद का अधिकारी बनता है।”
आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस गहन सत्य से प्रकाशित होती है कि वास्तविक आनंद प्राप्त करने और आनंद छीन लेने में बहुत अंतर है। संसार में बहुत-सी उपलब्धियाँ ऐसी हैं जिन्हें लोग सफलता कहते हैं, जबकि वे भीतर से पराजय होती हैं। यदि पद पाने के लिए किसी योग्य व्यक्ति का अधिकार छीना गया, यदि धन कमाने के लिए किसी की मजबूरी का लाभ उठाया गया, यदि सम्मान पाने के लिए किसी की प्रतिष्ठा को धूमिल किया गया, तो वह सफलता नहीं, आत्मा की पराजय है।
उनकी वाणी में उस समय एक पिता जैसी करुणा और एक ऋषि जैसी दूरदृष्टि दिखाई देती है। वे चाहते हैं कि मनुष्य केवल यह न सोचे कि “मुझे क्या मिला?”, बल्कि यह भी पूछे— “मेरे मिलने से किसी का क्या छिन गया?” क्योंकि यही प्रश्न मनुष्य को संवेदनशील बनाता है और यही संवेदनशीलता उसे वास्तविक धर्म के निकट ले जाती है।
वे आगे मानो यह भी कह रहे हों— “ऐसा जीवन जियो कि तुम्हारी प्रगति देखकर किसी की आँखों में ईर्ष्या नहीं, प्रेरणा जागे; तुम्हारी सफलता से किसी का अधिकार न छीने, बल्कि किसी का विश्वास बढ़े; तुम्हारी मुस्कान किसी की पीड़ा का कारण नहीं, बल्कि किसी के जीवन की आशा बने।”
अंततः आचार्य निखिल का यह संदेश केवल करुणा का नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का संदेश है। वे मानो कह रहे हों—
“सच्ची खुशी वही है जो बाँटने से बढ़े, किसी का हाथ थामने से मिले, किसी के आँसू पोंछने से जन्म ले। उस सुख से सदैव सावधान रहो जो किसी और के दुःख की कीमत पर मिला हो। क्योंकि वह सुख बाहर से चाहे कितना भी आकर्षक दिखाई दे, भीतर से वह एक ऐसे विष के समान है जो धीरे-धीरे मनुष्य के चरित्र, उसकी शांति और उसके आत्मप्रकाश को नष्ट कर देता है। इसके विपरीत, जो आनंद दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाकर प्राप्त होता है, वही शाश्वत है, वही पवित्र है और वही वास्तव में ईश्वर के निकट ले जाने वाला आनंद है।”
वक्ता
आचार्य निखिल जी महाराज
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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