“चरित्र की असल पहचान एकांत के निर्णयों में होती है”

 “चरित्र की असल पहचान एकांत के निर्णयों में होती है।”

जब आचार्य निखिल यह कहते हैं— 

“चरित्र के सबसे कठिन परीक्षण की घड़ी तब है, जब गलत करने का अवसर हो और कोई देख भी न रहा हो!” 

तब वे केवल नैतिकता का उपदेश नहीं दे रहे होते, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण की उस कसौटी का परिचय करा रहे होते हैं, जहाँ बाहरी कानून, समाज और प्रतिष्ठा सब पीछे छूट जाते हैं, और केवल व्यक्ति तथा उसकी आत्मा आमने-सामने खड़े रह जाते हैं। यह कथन बताता है कि चरित्र का निर्माण भीड़ में नहीं, बल्कि उन मौन क्षणों में होता है जहाँ सही और गलत के बीच निर्णय लेने वाला कोई दूसरा नहीं, केवल अपना विवेक होता है।

उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत गंभीर, आत्मदर्शी और करुणा से ओत-प्रोत प्रतीत होती है। वे अनुभव कर रहे होते हैं कि अधिकांश लोग तब तक ईमानदार रहते हैं, जब तक पकड़े जाने का भय बना रहता है। किंतु जहाँ अवसर भी हो, लाभ भी हो और देखने वाला कोई न हो, वहीं मनुष्य का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। गुरुजी का उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह स्मरण कराना है कि संसार की अदालत से बचा जा सकता है, पर अपनी अंतरात्मा की अदालत से नहीं।

मानो वे अपने शिष्यों से कह रहे हों— 

“यदि तुम्हारी अच्छाई केवल लोगों की उपस्थिति पर निर्भर है, तो वह चरित्र नहीं, केवल सामाजिक अभिनय है। चरित्र वह है, जो अंधकार में भी उतना ही उज्ज्वल रहता है जितना प्रकाश में। जिस व्यक्ति का विवेक जागृत है, उसके लिए अकेलापन भी उतना ही पवित्र है जितनी सभा।”

वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक राज्य में राजा ने अपने मंत्री की ईमानदारी की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उसने मंत्री को रात के समय राजकोष की चाबी देकर कहा— “मैं एक सप्ताह के लिए बाहर जा रहा हूँ।” खजाने में अपार धन था, वहाँ कोई प्रहरी भी नहीं था और किसी को इस बात की जानकारी भी नहीं थी। सप्ताह भर बाद लौटकर राजा ने देखा कि खजाने की एक मुद्रा भी कम नहीं हुई। उसने मंत्री से पूछा— “तुम्हें कैसे विश्वास रहा कि कोई तुम्हें देख नहीं रहा था?” मंत्री मुस्कुराकर बोला— “महाराज, लोग नहीं देख रहे थे, लेकिन मेरा विवेक मुझे हर क्षण देख रहा था।” गुरुजी कहते हैं— “यही चरित्र है। जहाँ बाहरी निगरानी समाप्त होती है, वहीं आत्मा की निगरानी प्रारंभ होती है।”

फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक मंदिर के निर्माण में दो कारीगर पत्थरों पर नक्काशी कर रहे थे। एक पत्थर मंदिर की दीवार के भीतर लगना था, जहाँ उसे कोई देख नहीं सकता था। दूसरे कारीगर ने कहा— “इसे इतना सुंदर बनाने की क्या आवश्यकता? यह तो किसी की दृष्टि में आएगा ही नहीं।” पहला कारीगर शांत स्वर में बोला— “लोग न देखें तो कोई बात नहीं, पर मैं तो जानता हूँ कि मैंने इसे कैसा बनाया है।” गुरुजी समझाते हैं— “जो व्यक्ति अपने अदृश्य कर्मों में भी उत्कृष्टता और सत्यनिष्ठा बनाए रखता है, वही वास्तविक चरित्रवान होता है।”

आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस सत्य से प्रकाशित होती है कि चरित्र बाहरी सम्मान से नहीं बनता, बल्कि भीतर की ईमानदारी से बनता है। वे जानते हैं कि समाज कभी-कभी गलत व्यक्ति की भी प्रशंसा कर देता है और सही व्यक्ति की आलोचना भी कर देता है। इसलिए वे मनुष्य को बाहरी प्रमाणपत्रों से अधिक अपने अंतःकरण के प्रमाणपत्र को महत्व देने की प्रेरणा देते हैं।

उनकी वाणी में उस समय एक गहरी करुणा भी है, क्योंकि वे जानते हैं कि प्रलोभन जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। धन का प्रलोभन, पद का प्रलोभन, प्रसिद्धि का प्रलोभन, सुविधा का प्रलोभन—ये सभी समय-समय पर मनुष्य के द्वार पर दस्तक देते हैं। किंतु वे यह समझाते हैं कि चरित्र का अर्थ प्रलोभनों का न होना नहीं, बल्कि प्रलोभनों के बीच भी सत्य का चयन करना है।

वे आगे मानो यह भी कह रहे हों— 

“यदि तुम चाहते हो कि लोग तुम पर विश्वास करें, तो पहले स्वयं ऐसे बनो कि तुम्हारी अंतरात्मा तुम पर विश्वास कर सके। क्योंकि संसार को धोखा देना कभी-कभी संभव हो सकता है, लेकिन स्वयं को धोखा देकर कोई भी लंबे समय तक शांत नहीं रह सकता।”

अंततः आचार्य निखिल का यह संदेश मनुष्य को बाहरी छवि से उठाकर आंतरिक सत्य की ओर ले जाता है। वे मानो कह रहे हों— 

“चरित्र वह दीपक है जो भीड़ की तालियों से नहीं, बल्कि अंतरात्मा के तेल से जलता है। इसलिए ऐसे बनो कि जब अवसर गलत का हो, लाभ सामने हो और देखने वाला कोई भी न हो, तब भी तुम्हारा विवेक तुम्हारा हाथ पकड़कर सही मार्ग पर चलाए। क्योंकि उसी क्षण तुम्हारा वास्तविक व्यक्तित्व जन्म लेता है। वही निर्णय तुम्हारे चरित्र की नींव बनता है, और वही नींव जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति सिद्ध होती है।”

वक्ता

 

पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति









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