नम्र होने की कीमत नहीं, उसकी शक्ति को पहचानिए

नम्र होने की कीमत नहीं, उसकी शक्ति को पहचानिए

भूमिका

समाज में अक्सर यह भ्रम बना रहता है कि नम्र व्यक्ति कमजोर होता है। इसलिए लोग उसकी सहनशीलता को उसकी विवशता और उसकी विनम्रता को उसकी पराजय समझ बैठते हैं। जबकि सत्य इसके ठीक विपरीत है। जो व्यक्ति भीतर से जितना अधिक संवेदनशील होता है, जीवन उतनी ही कठोर परीक्षाएँ उसके सामने रखता है। वह छल भी देखता है, उपेक्षा भी सहता है और विश्वासघात भी झेलता है।

किन्तु इन सबके बाद भी यदि उसके भीतर करुणा जीवित रहती है, यदि उसका व्यवहार मर्यादित बना रहता है और यदि उसका आत्मसम्मान अक्षुण्ण रहता है, तो समझ लेना चाहिए कि उसने नम्रता की वास्तविक साधना प्राप्त कर ली है।

सच्ची नम्रता परिस्थितियों से हारती नहीं, बल्कि उन्हें साध लेती है। वह आवश्यकता पड़ने पर कठोर निर्णय अवश्य लेती है, पर कभी कठोर हृदय नहीं बनती। यही नम्रता की सबसे बड़ी शक्ति है।

सरोज प्रसाद राय की निम्न पंक्तियाँ इसी जीवन-सत्य की ओर संकेत करती हैं।

नम्र होने की कीमत

"कठोर हो जाते हैं वे लोग,

जिन्होंने नम्र होने की कीमत चुकाई होती है।"

इन पंक्तियों को केवल बाहरी व्यवहार के आधार पर नहीं समझना चाहिए। यहाँ 'कठोर' होने का अर्थ संवेदनहीन हो जाना नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के प्रति सजग और आत्मसम्मान के प्रति दृढ़ हो जाना है।

जो लोग स्वभाव से नरम होते हैं, वे सबसे पहले दूसरों पर विश्वास करते हैं। वे हर व्यक्ति में अच्छाई खोजते हैं, दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानते हैं और संबंधों को लाभ-हानि के तराजू पर नहीं तौलते। यही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है और यही उनकी सबसे बड़ी परीक्षा भी।

जब बार-बार विश्वास टूटता है, तब वे अपने व्यवहार में सावधानी अवश्य लाते हैं, किन्तु अपनी विनम्रता नहीं खोते। वे अब हर किसी के लिए अपने हृदय के द्वार नहीं खोलते, पर जिनके लिए खोलते हैं, वहाँ आज भी वही आत्मीयता, वही करुणा और वही अपनापन मिलता है।

यही नरम और गरम होने का अंतर है।

नरम व्यक्ति, जब गरम होता है, तो उसका निर्णय दृढ़ हो जाता है; उसका चरित्र नहीं बदलता। उसका स्वर स्पष्ट हो जाता है; उसकी संस्कृति नहीं बदलती। वह अन्याय का विरोध करता है, पर घृणा का प्रचार नहीं करता। वह अपनी सीमाएँ निर्धारित करता है, पर दूसरों के प्रति सम्मान बनाए रखता है।

ऐसे लोग झुकना जानते हैं, टूटना नहीं; क्षमा करना जानते हैं, आत्मसम्मान बेचना नहीं; प्रेम करना जानते हैं, पर स्वयं को खो देना नहीं।

समाज में इन्हीं लोगों के कारण विश्वास जीवित रहता है। यही लोग स्त्री की पीड़ा को महसूस करते हैं, किसान के श्रम का सम्मान करते हैं, गरीब की विवशता को समझते हैं और अन्याय के विरुद्ध अपनी लेखनी या अपने कर्म से आवाज़ उठाते हैं।

इसलिए यदि किसी नम्र व्यक्ति के व्यवहार में आज गंभीरता दिखाई दे, तो उसे कठोरता मत समझिए। संभव है, वह अनुभवों की अग्नि से गुजरकर और अधिक परिपक्व हुआ हो। उसके भीतर की करुणा आज भी जीवित है; उसने केवल अपनी सरलता के साथ विवेक जोड़ लिया है।

याद रखिए—

जो वास्तव में नरम होते हैं, वे गरम होकर भी अपनी विनम्रता नहीं खोते। वे क्रोध में भी मर्यादा रखते हैं, विरोध में भी सम्मान रखते हैं और संघर्ष में भी मनुष्यता को जीवित रखते हैं।

यही भावुक और संवेदनशील नागरिकों की सबसे

बड़ी विशेषता है। उनकी नम्रता उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनके चरित्र की सबसे ऊँची शक्ति है। वे समय के साथ कठोर निर्णय लेना सीख जाते हैं, किन्तु अपने भीतर की करुणा को कभी मरने नहीं देते। यही उनका व्यक्तित्व है, यही उनका वैभव है और यही समाज की सबसे बड़ी नैतिक पूँजी है।

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