चुप साधना
चुप साधना
भूमिका
हम अक्सर मौन को केवल शब्दों की अनुपस्थिति समझ लेते हैं। पर क्या सचमुच चुप रह जाना ही मौन है? क्या ऐसा संभव है कि होंठ बिल्कुल शांत हों, फिर भी मन भीतर से लगातार बोलता रहे? और क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि हम कुछ न कहें, किसी पक्ष में न जाएँ, किसी के विरोध में न खड़े हों और कुछ क्षण केवल अपने भीतर घट रही हलचल को देखते रहें?
यहीं से ‘चुप साधना’ की जिज्ञासा जन्म लेती है। यह केवल चुप रहने की कला नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने का एक अवसर है। ऐसा अवसर, जहाँ कुछ देर के लिए हम संसार से ही नहीं, अपनी प्रतिक्रियाओं से भी दूरी बना सकें।
इन्हीं प्रश्नों के साथ प्रस्तुत है प्रमिला त्रिवेदी जी का यह आत्मचिंतन।
आलेख
चुप रहना भी एक साधना है।
हम दिन भर कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। किसी से अपनी बात कहते हैं, किसी की बात सुनते हैं, किसी बात पर सहमत होते हैं, तो किसी बात पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। बाहर की दुनिया में हमारी आवाज़ लगातार चलती रहती है। लेकिन कभी-कभी जीवन में ऐसा भी समय होना चाहिए, जब हम इस बाहरी शोर से स्वयं को अलग कर सकें।
यही तो चुप साधना की विलक्षणता है—सिर्फ होंठों की चुप्पी नहीं, बल्कि मन की चहल-पहल को भी कुछ देर शांत कर देना।
हम सामान्यतः चुप होते हैं, लेकिन भीतर लगातार संवाद चलता रहता है—किसी की कही हुई बात, कोई पुरानी स्मृति, कोई चिंता, कोई अपेक्षा, कोई शिकायत या किसी घटना के प्रति हमारी प्रतिक्रिया। चुप साधना में इन सबसे थोड़ी दूरी बनाना है।
मुझे तो लगता है कि आत्मा, परमात्मा, अच्छा, बुरा, झूठ और सच—इन सब विचारों को भी कुछ समय के लिए किनारे रखकर, केवल शांत चित्त से बैठकर स्वयं से मिलना ही चुप साधना है।
न किसी से शिकायत हो, न अपेक्षा; न किसी के प्रति प्रसन्नता का आग्रह हो, न क्रोध का बोझ। बस स्वयं के साथ होना—बिना किसी निर्णय के, बिना किसी निष्कर्ष के।
इसीलिए चुप साधना केवल बाहर के शोर से बचना नहीं है। यदि हम आरोप, प्रत्यारोप और बहानों के शोर से बचकर भी अपने भीतर वही सब दोहराते रहें, तो वह पूर्ण मौन नहीं है। चुप साधना में आत्मचिंतन और आत्ममंथन होना चाहिए।
लेकिन आत्मचिंतन का अर्थ यह भी नहीं कि हम अपने हर विचार को पकड़कर उसके पीछे चल पड़ें।
दिन में दो-चार बार कुछ समय के लिए एकदम शांत होकर बैठें। उस समय संसार के बारे में न सोचें, आत्मा के बारे में न सोचें, परमात्मा के बारे में भी न सोचें। बस शांत होकर बैठें।
ऐसे बैठने पर भीतर विचार अपने आप उठेंगे। कोई पुरानी स्मृति आएगी, कोई चिंता उभरेगी, कोई इच्छा सामने आएगी, कोई अप्रिय घटना याद आएगी। उस समय उन विचारों के साथ तादात्म्य स्थापित करने के बजाय उनसे तटस्थ रहने का प्रयास करें।
न उस विचार को अच्छा समझें, न बुरा।
न उसका समर्थन करें, न उसका विरोध।
न उसे पकड़ें, न उसे दबाएँ।
बस उसे आते-जाते हुए देखें।
शायद यहीं से मौन अपने वास्तविक अर्थ में प्रकट होता है।
क्योंकि कई बार हम चुप तो होते हैं, लेकिन भीतर किसी से बहस कर रहे होते हैं। किसी को दोष दे रहे होते हैं। किसी घटना को बार-बार दोहरा रहे होते हैं। अपने पक्ष को सही साबित कर रहे होते हैं या अपनी गलती के लिए कोई बहाना खोज रहे होते हैं। ऐसी स्थिति में होंठ भले ही शांत हों, मन शांत नहीं है।
चुप साधना उस आंतरिक शोर को पहचानने का नाम भी है।
चुप्पी हमेशा शांति का प्रतीक नहीं होती। कभी-कभी वह पुरानी धारणाओं के बदलने से पहले की एक गहरी साँस भी होती है।
हर रिश्ते में दोषारोपण करने की आदत भी अक्सर बचपन से ही पड़ जाती है। हम स्वयं को सुरक्षित रखना चाहते हैं, अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। कहीं चूक हो जाए, कोई गलत काम हो जाए या डाँट पड़ने का डर हो, तो अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय किसी दूसरे को दोष देना आसान लगता है। धीरे-धीरे यही बचने की प्रवृत्ति हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाती है।
यदि बचपन से ही अपनी भूल स्वीकार करने की आदत और सत्य के साथ चलने का साहस विकसित किया जाए, तो भविष्य में झूठ बोलकर गलत को सही साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। न अपनी गलती छिपाने की जरूरत होगी और न दूसरों पर आरोप लगाने की।
लेकिन यहाँ एक और सूक्ष्म बात समझनी होगी—सत्य से भागना भी चुप साधना नहीं है।
मौन वह साधना नहीं है, जो हमें सत्य से दूर ले जाए। मौन तो हमें इतना शांत करता है कि हम सत्य को बिना भय के देख सकें। अपने भीतर झाँक सकें। अपनी कमियों को स्वीकार कर सकें। अपने विचारों, प्रतिक्रियाओं और व्यवहार को बिना पक्षपात के देख सकें।
इसी अर्थ में मौन हमें मेडिटेशन, अर्थात ध्यान की ओर ले जाता है।
जब व्यक्ति शांत होकर बैठता है और भीतर उठने वाले विचारों से तटस्थ रहना सीखता है, तब धीरे-धीरे विचारों और स्वयं के बीच एक दूरी बनने लगती है। विचार आते हैं, लेकिन हम हर विचार नहीं बन जाते। भाव उठते हैं, लेकिन हम हर भाव के साथ बह नहीं जाते।
न अच्छा, न बुरा।
न समर्थन, न विरोध।
न आग्रह, न पूर्वाग्रह।
बस शांत साक्षी भाव।
यही स्थिति चुप साधना को साधारण चुप्पी से अलग करती है। यह भीतर की ऐसी अवस्था है, जहाँ मन अपने ही उठाए हुए प्रश्नों, प्रतिक्रियाओं और विचारों को देखने लगता है, लेकिन उनसे बंधता नहीं।
शायद यही समाधि का एक अलग स्वरूप भी है—जहाँ बाहर का संसार कुछ क्षणों के लिए पीछे छूट जाता है और व्यक्ति स्वयं के भीतर घट रहे अनुभव का मात्र साक्षी बन जाता है।
मुझे तो इसका सबसे सुंदर भाव यही लगता है—
> “जब शब्द चुप होते हैं, तो मौन सुनाई देता है;
> और जब विचार चुप होते हैं,
> तब शायद पहली बार स्वयं का होना महसूस होता है।”
और! जब यह मौन हमें स्वयं से मिलने, अपने भीतर झाँकने, आत्मचिंतन करने और सत्य से भागे बिना उसे स्वीकार करने की शक्ति देने लगे, तब समझना चाहिए कि चुप रहना केवल चुप रहना नहीं रहा—वह सचमुच साधना बन गया है।
सृजक


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