तीज का त्योहार

तीज का त्योहार

भूमिका

सावन की पहली फुहार पड़ते ही जैसे प्रकृति ही नहीं, मन भी हरियाली से भर उठता है। रिमझिम बारिश, झूलों की पेंग, हाथों में रची मेहंदी, सोलह श्रृंगार और सखियों की खिलखिलाहट—क्या यही तीज की पहचान है, या इसके पीछे छिपी है स्त्री-मन की कोई और सुंदर कहानी? आखिर क्यों सावन और तीज का उत्सव आते ही वातावरण में प्रेम, उमंग और उल्लास की ऐसी लहर दौड़ जाती है? इन्हीं भावों को सहज, मधुर और जीवंत शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं सुलोचना धनावत जी अपनी काव्य रचना में।

काव्य रचना

सावन का महीना बड़ा मनभावन,
प्रेम-सुधा रस बरसाने लगा है।
रिमझिम पड़ी सावन की फुहार,
पाँव थिरक रहे, हुआ मन बेकरार।

धरती सजी है दुल्हन के रंग में,
छाई है मदहोशी, हवा भी है मस्ती में।
सोलह श्रृंगार करूँ, मेहंदी लगाऊँ,
मधुर संगीत मेरा मन गुनगुनाए।

झूला झूले सखी, आनंद उठाए,
तीज का त्योहार है, मिलकर मनाएँ।

व्याख्या

सुलोचना धनावत जी की यह रचना सावन और तीज के माध्यम से प्रकृति, प्रेम, श्रृंगार, स्त्री-मन और सामूहिक उल्लास का सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है। कवयित्री के लिए सावन केवल वर्षा का महीना नहीं, बल्कि भावनाओं के जागरण और जीवन में नई उमंग के आगमन का प्रतीक है।

कविता की शुरुआत सावन की मनभावन छवि से होती है। रिमझिम फुहारें वातावरण को शीतल बनाती हैं और मन में प्रेम तथा आनंद का संचार करती हैं। बारिश की बूंदों का प्रभाव इतना गहरा है कि मन स्थिर नहीं रह पाता; पाँव स्वयं थिरकने लगते हैं और भीतर उत्साह की लहर उठती है।

इसके बाद कवयित्री प्रकृति का मानवीकरण करती हैं। वर्षा से निखरी धरती उन्हें दुल्हन की तरह सजी हुई दिखाई देती है। हवा में भी मस्ती है और पूरे वातावरण में एक मोहक उल्लास व्याप्त है। प्रकृति और मनुष्य के भाव यहाँ एक-दूसरे में घुलते हुए दिखाई देते हैं।

तीज के अवसर पर सोलह श्रृंगार, मेहंदी, मधुर संगीत और झूले स्त्री-सौंदर्य तथा उत्सवधर्मिता के प्रतीक बनकर सामने आते हैं। कवयित्री की दृष्टि में तीज केवल व्यक्तिगत श्रृंगार का पर्व नहीं, बल्कि सखियों के साथ मिलकर आनंद बाँटने और सामूहिक प्रसन्नता का अवसर है। अंतिम पंक्ति—“तीज का त्योहार है, मिलकर मनाएँ”—पूरी रचना के सामूहिक और उत्सवी भाव को सार्थक करती है।

रचनाकार की मनःस्थिति

इस रचना में सुलोचना धनावत जी की मनःस्थिति उल्लास, उमंग, प्रेम, सौंदर्य-बोध और उत्सवप्रियता से परिपूर्ण दिखाई देती है। सावन की फुहारों ने उनके भीतर सुप्त आनंद को जगा दिया है। वे प्रकृति को केवल देख नहीं रही हैं, बल्कि उसे अपने भीतर अनुभव कर रही हैं।

उनकी मनःस्थिति में बालसुलभ चंचलता और स्त्रियोचित श्रृंगार-बोध का सुंदर समन्वय है। मेहंदी लगाने, सोलह श्रृंगार करने, संगीत गुनगुनाने और झूला झूलने की कल्पना उनके भीतर के सहज आनंद को प्रकट करती है। साथ ही, सखियों के साथ मिलकर तीज मनाने की इच्छा यह बताती है कि उनके लिए खुशी तब और अधिक सार्थक हो जाती है, जब वह साझी खुशी बन जाए।

कुल मिलाकर, यह कविता सावन और तीज के बहाने प्रकृति के सौंदर्य में जीवन के उल्लास को खोजती है। इसमें कोई जटिल दर्शन नहीं, बल्कि जीवन को उसके सरल, सहज और सुंदर रूप में जीने की आकांक्षा है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।

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