ना करें अन्न का अपमान
ना करें अन्न का अपमान
भूमिका
क्या आपने कभी उस अदृश्य दर्द को महसूस किया है, जो आपकी थाली से कचरे के डिब्बे में गिरते भोजन के एक निवाले के साथ जुड़ा होता है? वह निवाला केवल अनाज का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि भीषण गर्मी और हाड़ कंपाती ठंड में मिट्टी से अनाज उपजाते एक किसान के महीनों के पसीने का मोल है। एक तरफ जहां वैभवशाली आयोजनों और शादियों में डस्टबिनों को लजीज पकवानों से भरा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के किसी कोने में कोई बेबस मां अपने भूखे बच्चे को थपकी देकर सुलाने पर मजबूर है। यह दृश्य केवल भोजन की बर्बादी की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि हमारी संवेदनहीन होती मानवीय चेतना पर एक करारा तमाचा है। आइए, इस गंभीर सामाजिक त्रासदी के विविध पहलुओं को समझें और यह जानें कि अन्न का सम्मान करना हमारे अस्तित्व और नैतिकता के लिए क्यों अनिवार्य है।
आलेख
भोजन का एक साधारण सा दिखने वाला टुकड़ा असल में प्रकृति के संतुलन और मानव-श्रम का अद्भुत संगम है। एक छोटे से बीज को थाली के '56 भोग' तक पहुंचने के लिए एक लंबी और कठिन यात्रा तय करनी पड़ती है। किसान दिन-रात एक करके खेत की जुताई करता है, मौसम की बेरुखी झेलता है और सिंचाई के जतन जुटाता है। महीनों के कड़े परिश्रम और कुदरत की अनुकंपा के बाद जब अनाज की फसल कटती है, तब कहीं जाकर वह हमारे सामने परोसी जाती है। दुखद बात यह है कि जिस भोजन को हमारी थाली तक पहुंचने में महीनों लग गए, उसे जूठा छोड़कर कचरे में फेंकने में हमें एक पल की भी झिझक नहीं होती।
यह अपव्यय केवल भौतिक वस्तुओं का नुकसान नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों पर आघात है। भारतीय दर्शन में अन्न को मात्र पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि 'परम ब्रह्म' का दर्जा दिया गया है। हमारे शास्त्रों और संस्कारों ने हमें सिखाया है कि अन्न में प्राण बसते हैं और उसका अनादर करना सीधे ईश्वर का तिरस्कार करना है। जिस समाज की नींव ही अन्नपूर्णा देवी के नमन पर रखी गई हो, उसी समाज का इस कदर संवेदनहीन हो जाना एक गहरे नैतिक पतन को दर्शाता है।
आजकल शादी-ब्याह, बहुभोज और दिखावे के आयोजनों में भोजन की बर्बादी एक नए 'स्टेटस सिंबल' का रूप ले चुकी है। 'जितना बड़ा कार्यक्रम, उतनी ही बड़ी भोजन की तबाही' का यह चलन हमारी खोखली मानसिकता को उजागर करता है। एक ओर तो देश की एक बड़ी आबादी को एक वक्त की रोटी के लिए भी दर-दर भटकना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर आयोजनों में टनों खाना नालियों और कूड़ेदानों के हवाले कर दिया जाता है। यह विषमता केवल सामाजिक अन्याय नहीं, बल्कि एक आपराधिक कृत्य है।
अन्न की इस अनदेखी का एक भयानक पहलू पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है, जिस पर अमूमन चर्चा नहीं होती। जब हम भोजन बर्बाद करते हैं, तो हम केवल अनाज नहीं फेंकते; बल्कि उस अनाज को उगाने में इस्तेमाल हुए अरबों लीटर पानी, उपजाऊ भूमि, ईंधन और बिजली को भी व्यर्थ गंवा देते हैं। इतना ही नहीं, जब यह फेंका हुआ भोजन कूड़े के ढेरों में सड़ता है, तो इससे मीथेन जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं जो पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग के लिए अत्यंत घातक हैं। इस प्रकार, हमारी एक छोटी सी लापरवाही देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों पर भारी पड़ रही है।
इस स्थिति से निपटने के लिए हमें अपनी आदतों और जीवनशैली में तत्काल बदलाव लाना होगा। भोजन लेते समय स्वयं पर यह अनुशासन लागू करना होगा कि हम उतना ही खाना प्लेट में लें, जितनी भूख हो। साथ ही दूसरों की थाली में जबरन खाना परोसने की हमारी सामाजिक आदत को भी बदलना पड़ेगा। यदि किसी आयोजन के बाद भोजन बच भी जाता है, तो उसे फेंकने के बजाय तुरंत और सम्मानजनक तरीके से भूखे व जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का प्रबंध किया जाना चाहिए।
अब समय आ गया है कि हम सब मिलकर इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एक सामूहिक चेतना जगाएं। यदि हम सब आज ही यह प्रण लें कि भविष्य में कभी अपनी थाली में अन्न का अपमान नहीं होने देंगे, तो हम न केवल लाखों भूखे पेटों तक निवाला पहुंचा सकेंगे, बल्कि अपने देश को भुखमरी के कलंक से मुक्त कराकर एक समृद्ध और संवेदनशील समाज का निर्माण भी कर पाएंगे।
सृजक
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