भावों से भाव का संचार

चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई

सीमा पर रात बहुत शांत थी।

दूर पहाड़ों पर बर्फ चमक रही थी और आसमान में अनगिनत सितारे टिमटिमा रहे थे।

चौकी पर बैठा अभय अपनी हथेलियों में एक कागज़ थामे हुए था।

वह कई दिनों से अपनी माँ को चिट्ठी लिखना चाहता था।

आज उसने आखिरकार कलम उठा ली।

उसने लिखा—

“माँ,

तुम हमेशा कहती थीं कि बेटा चाहे कितना भी दूर चला जाए, माँ की दुआ उसके साथ रहती है।

अब समझ आया है कि तुम्हारी दुआ कितनी दूर तक आती है।

यहाँ रातें बहुत लंबी होती हैं माँ, लेकिन जब मुझे घर की याद आती है तो मैं आँखें बंद करके तुम्हारे आँगन को याद करता हूँ।

वही नीम का पेड़…

वही तुलसी का चौरा…

और दरवाजे पर बैठी तुम।

माँ, तुम अब भी मेरे लौटने की राह देखती होगी ना?

मैंने तुमसे वादा किया था कि अगली छुट्टी में तुम्हारे हाथ की खीर जरूर खाऊँगा।

इस बार देर हो गई तो नाराज़ मत होना।

तुम्हारा बेटा तुम्हें बहुत याद करता है।"

—अभय

अभय ने चिट्ठी पढ़ी।

कुछ पल मुस्कुराया।

फिर कागज़ को मोड़कर जेब में रख लिया।

“सुबह डाक के साथ भेज दूँगा।”

उसने आसमान की ओर देखा और आँखें बंद कर लीं।

लेकिन सुबह होने से पहले ही सीमा पर अचानक हलचल मच गई।

अभय और उसके साथी मोर्चे पर पहुँच गए।

कई घंटे तक वे अपनी चौकी की रक्षा करते रहे।

जब सब शांत हुआ तो सूरज निकल चुका था।

लेकिन अभय वापस नहीं लौटा।

उसकी जेब में वही चिट्ठी रह गई।

--

गाँव में उसकी माँ सरस्वती हर सुबह दरवाजे पर बैठती थी।

उसे बेटे की चिट्ठियों का इंतज़ार रहता था।

कभी डाकिया आता तो वह दूर से ही पूछती—

“बेटा, मेरे अभय की चिट्ठी है?”

डाकिया मुस्कुराकर कहता—

“आज नहीं अम्मा… अगली बार जरूर होगी।”

माँ फिर दरवाजे पर बैठ जाती।

एक दिन सेना की गाड़ी गाँव में आकर रुकी।

सरस्वती समझ गई।

उसने कुछ पूछा नहीं।

बस आसमान की ओर देखकर बोली—

“मेरा बेटा अपना वादा निभाकर गया है।”

उस दिन गाँव का हर व्यक्ति रोया।

लेकिन सरस्वती नहीं रोई।

उसने बेटे की तस्वीर अपने सीने से लगाई और कहा—

“तूने कहा था ना कि माँ, मेरी दुआ मेरे साथ रहेगी?

देख… मैं रो नहीं रही।

तेरी दुआ को कमजोर थोड़े ही पड़ने दूँगी।”

---

समय बीतता गया।

एक वर्ष।

दो वर्ष।

पाँच वर्ष।

सरस्वती की उम्र बढ़ती गई, मगर दरवाजे पर बैठने की उसकी आदत नहीं बदली।

एक दिन गाँव में स्कूल के बच्चे स्वतंत्रता दिवस की तैयारी कर रहे थे।

उनमें से एक बच्चा सरस्वती के घर आया।

“अम्मा, स्कूल में फौजियों पर प्रदर्शनी लग रही है। आपके पास अभय भैया की कोई चीज़ हो तो दे दीजिए।”

सरस्वती ने अंदर जाकर एक पुराना संदूक खोला।

उसमें अभय की वर्दी, कुछ तस्वीरें और उसकी बचपन की छोटी-सी लकड़ी की तलवार रखी थी।

तभी संदूक के नीचे दबा एक मुड़ा हुआ कागज़ दिखाई दिया।

सरस्वती ने उसे उठाया।

कागज़ खोलते ही उसकी आँखें ठहर गईं।

वह वही चिट्ठी थी।

अभय की लिखावट।

उसने काँपते हाथों से पढ़ना शुरू किया।

हर शब्द के साथ उसकी आँखों से आँसू गिरते गए।

“माँ, तुम अब भी मेरे लौटने की राह देखती होगी ना?”

सरस्वती ने चिट्ठी को सीने से लगा लिया।

बहुत देर तक कुछ नहीं बोली।

फिर मुस्कुराई।

“देख बेटा… मैं आज भी तेरी राह देखती हूँ।”

बाहर बच्चे तिरंगा लेकर खड़े थे।

सरस्वती धीरे-धीरे बाहर आई।

उसने चिट्ठी एक बच्चे को देते हुए कहा—

“इसे प्रदर्शनी में मत रखना बेटा।”

बच्चे ने पूछा—

“क्यों अम्मा?”

सरस्वती ने तिरंगे की ओर देखते हुए कहा—

“क्योंकि यह सिर्फ़ मेरे बेटे की चिट्ठी नहीं है।

यह उन सारे फौजियों की चिट्ठी है,

जो अपने घर लौट नहीं पाए…

लेकिन जिनकी यादें आज भी हर माँ के आँगन में रहती हैं।”

बच्चा चुप हो गया।

सरस्वती ने चिट्ठी को माथे से लगाया।

और उसी क्षण हवा का एक झोंका आया।

सामने लगा तिरंगा पूरी शान से लहराने लगा।

सरस्वती की आँखें नम थीं।

लेकिन चेहरे पर वही गर्व था।

उसने आसमान की ओर देखकर कहा—

“अभय…

तेरी चिट्ठी देर से मिली,

लेकिन माँ तक पहुँच ही गई।”

और शायद उस दिन पहली बार उसे लगा—

कुछ चिट्ठियाँ डाक से नहीं जातीं।

वे सीधे माँ के हृदय तक पहुँचती हैं। 🇮🇳🌹

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