जज़्बात : एक अदाकारा को लेकर

जज़्बात : एक अदाकारा को लेकर

अजीब दास्तां है ये—कहाँ शुरू, कहाँ ख़त्म

भूमिका

कुछ चेहरे पर्दे पर दिखाई देते हैं और कहानी ख़त्म होने के बाद भी मन में रह जाते हैं। कुछ आवाज़ें कानों से गुजरकर सीधे दिल में उतरती हैं, और कुछ कलाकार अपने किरदारों को निभाते-निभाते स्वयं एक किरदार बन जाते हैं। मीना कुमारी भी ऐसी ही अदाकारा थीं—जिन्होंने पर्दे पर दर्द को केवल अभिनय नहीं किया, बल्कि उसे अपनी आवाज़, आँखों और भाव-भंगिमाओं में जीवंत कर दिया। मगर सवाल यह है कि जिस स्त्री ने करोड़ों दर्शकों को भावनाओं की भाषा समझाई, क्या दुनिया कभी उसके अपने दिल की दास्तां समझ पाई?

दर्द लिखती थी जो कलम से हर बार

दर्द लिखती थी जो कलम से हर बार,

समझा नहीं दुनिया ने कभी उनके दिल का हाल।

‘ट्रेजेडी क्वीन’ के नाम से मशहूर हो गईं,

जानते नहीं लोग—उनकी ज़िंदगी थी उनके लिए कितना बड़ा सवाल।

खूबसूरत अदाकारा, खूबसूरत चेहरा और खनकती आवाज़ की मलिका—मीना कुमारी। ‘ट्रेजेडी क्वीन’ के नाम से मशहूर एक ऐसी अदाकारा, जिसकी पूरी ज़िंदगी सिनेमा के पर्दे पर भारतीय नारी की पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए गुज़री। लेकिन ट्रेजेडी के अलावा भी वे अभिनय के अनेक रंगों से रंगी थीं। उनके अभिनय का हर रंग लाजवाब और बेहतरीन था।

खूबसूरती के साथ-साथ अपने अभिनय के कारण भी उन्हें हमेशा याद किया जाता है। बॉलीवुड में बहुत-सी अदाकाराएँ अपनी खूबसूरती के लिए चर्चित रही हैं, जिनमें मीना कुमारी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। वे अपनी खूबसूरती के साथ-साथ कमाल का हुनर भी रखती थीं। कहा जाता है कि दिलीप कुमार जैसे जानदार अभिनेता भी उनके सामने टिक नहीं पाते थे।

मीना कुमारी जैसी आवाज़ किसी दूसरी अदाकारा की थी ही नहीं। ऐसी आवाज़, जिसे सुनकर राज कपूर साहब तक अपने संवाद भूल जाते थे। उनकी आवाज़ में एक खनक थी—एक दर्द भरी खनक, जो किसी के भी दिल में गहराई तक उतर जाती थी।

महज़बीन बेगम के नाम से 1 अगस्त 1932 को महाराष्ट्र में जन्मीं मीना कुमारी ने पारिवारिक परिस्थितियों के चलते बहुत कम उम्र में फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। छोटी-सी आयु में उन्होंने 12 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया और कम उम्र में ही बॉलीवुड में एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया।

‘बैजू बावरा’ उनकी पहली ऐसी फिल्म थी, जिसमें उन्होंने नायिका के तौर पर काम किया। फिल्म के गीत बेहद लोकप्रिय हुए। मसलन—“दूर कोई गाए, धुन ये सुनाए, तेरे बिना छलिया रे, बाजे ना मुरलिया रे।” इसी फिल्म का एक और गीत—“मोहे भूल गए साँवरिया”—भी बहुत लोकप्रिय हुआ।

‘साहिब बीवी और गुलाम’ उनकी सबसे अधिक चर्चित फिल्मों में से एक थी, जिसमें उनके अभिनय ने उन्हें बुलंदियों पर पहुँचा दिया। अपने अभिनय से अमिट छाप छोड़ने वाली मीना कुमारी लगभग 32 वर्षों तक बॉलीवुड में दर्शकों के दिलों पर राज करती रहीं।

आइए, उनकी कुछ ऐसी फिल्मों से रूबरू होते हैं, जो उनकी बेबसी, उनकी ख़्वाहिश और उनकी तड़प को बखूबी बयां करती हैं।

‘साहिब बीवी और गुलाम’ की सामंती अत्याचार सहने वाली बहू, जो अपने पति का प्यार पाने के लिए स्वयं को शराब में डुबो देती है। “न जाओ सैंया, छुड़ा के बैयाँ” गीत गाकर जिस अंदाज़ में वे अपने पति को रोकती हैं, वह आज भी लाजवाब लगता है। इसी फिल्म का एक और गीत—“पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे कि मैं तन-मन की सुध-बुध भुला बैठी”—में नायिका की बेकरारी देखते ही बनती है।

उसी तरह ‘ग़ज़ल’ फिल्म में “रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ” गीत में भी नायिका की बेबसी और पीड़ा साफ़ नज़र आती है।

फिल्म ‘काजल’ में भक्ति भाव से “तोरा मन दर्पण कहलाए” गाते हुए उनके चेहरे पर असीम शांति का भाव दिखाई देता है।

‘बहू बेगम’ में “हम इंतज़ार करेंगे तेरा क़यामत तक” और “दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें”—दोनों गीतों में उन्होंने अपने अभिनय से जैसे जान डाल दी।

‘दिल अपना और प्रीत पराई’ की नर्स को कौन भूल सकता है? शाम के समय नौका में जीवन की सच्चाई को बयान करता यह गीत आज भी हर कोई गुनगुनाता है—“अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू, कहाँ ख़त्म।”

‘दिल एक मंदिर’ की वह दुल्हन भी यादगार है, जो बीमार पति की सेवा करते हुए उसके साथ बिताए कुछ पलों को फिर से जीना चाहती है। “रुक जा रात, ठहर जा रे चंदा, बीते ना मिलन की बेला”—गाते हुए उनके अभिनय में एक उम्मीद के साथ तड़प भी साफ़ दिखाई देती है।

उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में ‘पाकीज़ा’ का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। इसमें उन्होंने कोठे पर बैठी तवायफ़ साहिबजान की ख़्वाहिश, बेबसी और तड़प को बखूबी अभिव्यक्त किया। रात में ट्रेन के डिब्बे में इश्क़ की एक ऐसी कहानी शुरू होती है, जो उनके खूबसूरत पाँवों से जुड़ी एक पर्ची से आगे बढ़ती है—“आपके पाँव बेहद खूबसूरत हैं। इन्हें ज़मीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएँगे।”

इस फिल्म के यूँ तो लगभग सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए, लेकिन “चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था” गीत उनकी निजी ज़िंदगी के काफी करीब महसूस होता है। मीना कुमारी के शब्दों में—

“आगाज़ तो होता है, अंजाम नहीं होता,

जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता।”

जी हाँ, कमाल अमरोही वह नाम थे, जो उनकी ज़िंदगी में प्यार बनकर तो आए, पर साथ नहीं निभा पाए। उनके लिए मीना कुमारी ने कहा—

“दिल सा जो साथी पाया,

बेचैनी भी वह साथ ले आया।”

पुणे के अस्पताल में कार दुर्घटना के बाद जब मीना कुमारी भर्ती थीं, तब कमाल अमरोही उनसे मिलने आए और उनका हाथ अपने हाथों में लेकर अपने प्रेम का पहला इज़हार किया था। यहीं से उनकी प्रेम कहानी शुरू हुई थी। अपने आख़िरी दिनों में, जब मीना कुमारी बीमार होकर फिर अस्पताल में भर्ती हुईं, तो यही कहानी 21 साल बाद एक बार फिर जैसे दोहराई गई।

निजी ज़िंदगी में मिले ज़ख्मों की वजह से उन्हें शराब की लत लग गई थी। डॉक्टर ने दवा के रूप में लेने को कहा और धीरे-धीरे वे इसकी शिकार हो गईं। शायद शराब के रूप में उन्होंने अपने दर्द को पीकर जीने की कोशिश की।

बीमार होने पर जब मीना कुमारी अस्पताल जाने लगीं, तो उन्होंने पीछे मुड़कर जैसे अलविदा भरी नज़रों से हर चीज़ को निहारा। बेहद कम उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह जाने वाली यह नायिका बॉलीवुड में जितनी सफल रहीं, अपनी निजी ज़िंदगी में उतनी ही नाकाम भी रहीं।

यह भी एक अजीब इत्तफ़ाक़ था कि जब उनका जन्म हुआ, तब उनके माता-पिता के पास पैसे नहीं थे और जब उनकी मृत्यु हुई, तब भी हालात कुछ ऐसे ही थे। मीना कुमारी मरना नहीं चाहती थीं, लेकिन 31 मार्च 1972 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गईं।

जीवन जो प्यार से चलता है, वही उनकी किस्मत में नहीं था। सिर्फ़ ग़मों का अंबार था, जिसने उन्हें ‘ट्रेजेडी क्वीन’ बना दिया। उन्हें गए पाँच दशक से भी अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उनके द्वारा बनाया गया मुकाम आज तक कोई और छू नहीं सका है।

ना हाथ थाम सके, ना पकड़ सके दामन,

बड़े करीब से उठकर चला गया कोई।

सृजक

प्रस्तुति





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