मौन का अपनापन
मौन का अपनापन
भूमिका
रिश्तों की सबसे बड़ी पहचान केवल साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के मन में बसे रहने की अनुभूति है। शब्द कभी-कभी रिश्तों को व्यक्त करते हैं, किंतु आत्मीयता उन्हें जीवंत बनाती है। जब संबंधों में स्वार्थ नहीं, बल्कि अपनापन होता है, तब छोटी-सी मुस्कान, एक मौन दृष्टि या बिना कहे किया गया सहयोग भी बहुत कुछ कह जाता है। इसलिए कहा गया है— *"आत्मीयता के स्वर कितने निर्मल होते हैं इसका एहसास रिश्ते ही तब करा देते हैं जब वो टूटते नहीं, बस मौन हो जाते हैं। यह निर्मलता की प्रामाणिकता ही तो है।"*
यह कथन केवल रिश्तों की संवेदनशीलता का वर्णन नहीं करता, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे प्रेम, विश्वास और आत्मीयता की सबसे सूक्ष्म परतों को भी उद्घाटित करता है।
मौन हमेशा दूरी नहीं होता
अक्सर हम यह मान लेते हैं कि यदि कोई व्यक्ति पहले की तरह बात नहीं कर रहा, तो संबंध समाप्त हो गया है। जबकि हर मौन दूरी का संकेत नहीं होता। कई बार परिस्थितियाँ, समय, जिम्मेदारियाँ, मन की थकान या जीवन की व्यस्तताएँ शब्दों को रोक देती हैं, लेकिन मन का स्नेह वहीं बना रहता है।
यही कारण है कि कुछ रिश्ते वर्षों तक बिना संवाद के भी जीवित रहते हैं। जब दो लोग दोबारा मिलते हैं, तो ऐसा लगता है मानो समय ने उनके बीच कोई दूरी बनाई ही नहीं। यह आत्मीयता की सबसे बड़ी पहचान है।
टूटना और मौन हो जाना—दोनों अलग बातें हैं
रिश्ता टूटता तब है जब विश्वास समाप्त हो जाता है, सम्मान नष्ट हो जाता है और मन में कटुता घर कर जाती है।
परंतु जब रिश्ता केवल मौन हो जाता है, तब उसके भीतर कहीं न कहीं प्रेम, सम्मान और स्मृतियाँ जीवित रहती हैं। शब्द रुक जाते हैं, पर शुभकामनाएँ नहीं रुकतीं। संवाद कम हो जाता है, पर चिंता समाप्त नहीं होती।
यही मौन यह प्रमाण देता है कि संबंध किसी स्वार्थ पर नहीं, बल्कि आत्मीयता की नींव पर खड़ा था।
आत्मीयता की निर्मलता क्या है?
निर्मलता का अर्थ है—जिसमें छल न हो, अपेक्षाओं का बोझ न हो और अधिकार से अधिक अपनापन हो।
ऐसा संबंध यह हिसाब नहीं रखता कि किसने पहले फोन किया, किसने संदेश भेजा या किसने अधिक समय दिया। वहाँ गणना नहीं, भावना होती है।
जिस प्रकार स्वच्छ जल अपने आप पारदर्शी होता है, उसी प्रकार सच्ची आत्मीयता स्वयं अपने अस्तित्व का प्रमाण होती है। उसे बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
प्रथम उदाहरण
एक शिक्षक अपने विद्यार्थी को वर्षों तक पढ़ाता है। शिक्षा पूरी होने के बाद दोनों का नियमित संपर्क समाप्त हो जाता है। वर्षों बाद विद्यार्थी सफलता प्राप्त करता है और सबसे पहले अपने गुरु को प्रणाम करने पहुँचता है। इतने वर्षों का मौन उस आत्मीय संबंध को समाप्त नहीं कर पाया, क्योंकि वह केवल शब्दों का नहीं, संस्कारों का संबंध था।
द्वितीय उदाहरण
दो मित्र बचपन में हर दिन साथ रहते थे। नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें अलग-अलग शहरों में पहुँचा दिया। महीनों तक बात नहीं होती। लेकिन जब किसी एक पर कठिन समय आता है, तो दूसरा बिना बुलाए उसके पास पहुँच जाता है। यह आत्मीयता का वही स्वर है जो मौन में भी सुनाई देता रहता है।
तृतीय उदाहरण
घर में माता-पिता और संतान के बीच कभी-कभी विचारों का मतभेद हो जाता है। कुछ समय तक बातचीत कम हो जाती है। फिर भी माँ हर दिन उसके लिए प्रार्थना करती है और पिता उसके भविष्य की चिंता करते हैं। शब्द भले कम हो गए हों, लेकिन आत्मीयता का प्रवाह कभी रुकता नहीं। यही रिश्तों की वास्तविक शक्ति है।
मौन हमें क्या सिखाता है?
मौन यह सिखाता है कि हर संबंध को शब्दों से नहीं परखा जा सकता। कुछ रिश्तों की गहराई उनके शांत रहने में ही दिखाई देती है। यदि हर बार सामने वाला अपनी भावनाएँ व्यक्त न कर पाए, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके मन में अपनापन समाप्त हो गया है।
इसलिए किसी रिश्ते का मूल्य केवल संवाद की मात्रा से नहीं, बल्कि संवेदना की निरंतरता से आँकना चाहिए।
किन बातों से बचना चाहिए?
कई बार हमारा अहंकार मौन को गलत अर्थ दे देता है। हम सोच लेते हैं कि सामने वाले को हमारी परवाह नहीं रही। बिना सत्य जाने निर्णय लेना, अनुमान लगा लेना और मन में शिकायतें पाल लेना, इन्हीं कारणों से आत्मीय संबंध वास्तव में टूटने लगते हैं।
यदि मन में विश्वास बना रहे और संवाद का द्वार खुला रहे, तो मौन भी संबंधों को परिपक्व बना देता है।
निष्कर्ष
आत्मीयता कभी शोर नहीं करती। वह नदी की उस शांत धारा की तरह होती है जो बिना किसी घोषणा के जीवन को सींचती रहती है। शब्दों का अभाव संबंधों का अंत नहीं होता; कई बार वही उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होता है। जो रिश्ता इस परीक्षा में भी सम्मान, विश्वास और शुभभाव बनाए रखता है, वही वास्तव में निर्मल और प्रामाणिक कहलाता है।
इसलिए संबंधों को केवल बातचीत से नहीं, बल्कि उनके भीतर बहती निस्वार्थ संवेदना से पहचानना चाहिए। जहाँ आत्मीयता जीवित होती है, वहाँ मौन भी संवाद बन जाता है, दूरी भी निकटता का अनुभव करा देती है और समय भी प्रेम की निर्मलता को कम नहीं कर पाता। यही किसी भी सच्चे रिश्ते की सबसे सुंदर और सबसे विश्वसनीय पहचान है।
सृजक
श्रीमती विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका, उलझन सुलझन
महिला लेखिका प्रकोष्ठ





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