खूब कूटिए अदरक

खूब कूटिए अदरक

आखिर क्या-क्या कूटना है?

भूमिका

अदरक तो हम रोज़ कूटते हैं—चाय को स्वाद, खुशबू और गर्माहट देने के लिए।

लेकिन क्या कभी सोचा है कि हमारे भीतर भी कुछ ऐसा जमा होता रहता है, जिसे कूटे बिना मन हल्का नहीं होता?

अधूरी इच्छाएँ, सुबह की झकझक से आया गुस्सा, किसी की दगाबाजी का दर्द, रिश्तों की खटास, अपनी ही परिस्थितियों से शिकायत और कभी-कभी ईश्वर से भी अनकही नाराज़गी...

तो क्यों न आज अदरक के साथ-साथ इन्हें भी कूट लिया जाए?

फर्क बस इतना हो कि अदरक कूटकर चाय बने और मन की भड़ास कूटकर जीवन में मिठास, संबंधों में गहराई और भीतर एक नया उत्साह पैदा हो।

यही इस शब्द-संकलन की खूबसूरती है—यह हमें दुखों से भागने की नहीं, उन्हें पहचानकर, स्वीकारकर और फिर उनसे आगे निकल जाने की राह दिखाता है।











मुक्त भाव

खूब कूटिए अदरक के साथ काली मिर्च, लौंग-इलाइची और दालचीनी...

बनाइए मस्त-मस्त चाय और खुश कीजिए मेहमानों को पिलाकर।

पर... पर... पर...

खूब कूटिए साथ में अपनी उन अधूरी ख्वाहिशों को, जो हो न सकीं पूरी...

और दृढ़विश्वास के साथ बढ़ जाइए आगे, उन्हें पूरा करने के लिए।

खूब कूटिए अपना वो गुस्सा, जो सुबह हुई झकझक से आया था...

पर बढ़ जाइए आगे, अपने संबंधों को और भी मधुर और प्रगाढ़ बनाने में।

खूब कूटिए उन मक्कारों की दगाबाजियों को, जो आपके साथ हुई हैं...

पर मन बड़ा करके उन्हें माफ कर दीजिए और ईश्वर से दुआ कीजिए उनके लिए भी।

खूब कीजिए अदरक कूटकर भगवान पर गुस्सा कि क्यों कुछ कसर रखा है...

पर रखिए विश्वास उस पर हमेशा कि समय आने पर वही देगा हमें सबकुछ।

खूब जोर-जोर से कूटते रहिए अदरक...

निकालते रहिए अपने मन की भड़ास...

और सदैव खुशमिजाज बने रहिए।

सुषमा अग्रवाल

विस्तृत व्याख्या 

कूटना है, कुचलना नहीं

इस रचना का सबसे सुंदर पक्ष इसका ‘कूटना’ शब्द है। सामान्यतः कूटना किसी वस्तु को छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलने की प्रक्रिया है, लेकिन यहाँ यही शब्द मनोभावों के लिए एक गहरे जीवन-दर्शन का रूप ले लेता है।

हमारे जीवन में बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जिन्हें हम भीतर दबाते चले जाते हैं। कोई इच्छा पूरी नहीं हुई तो उसका मलाल, किसी ने अपेक्षा के विपरीत व्यवहार किया तो शिकायत, किसी अपने से मनमुटाव हुआ तो क्रोध और किसी ने धोखा दिया तो भीतर बैठी टीस।

ये भाव यदि मन में पड़े रहें तो धीरे-धीरे मन को भारी करते जाते हैं।

लेखिका कहती हैं—उन्हें कूटिए।

लेकिन इसका अर्थ उन्हें नष्ट करना नहीं है। इसका अर्थ है उन्हें इतना मथ देना कि उनका कड़वापन हमारी चेतना पर हावी न रहे।

अधूरी ख्वाहिशें

हर इच्छा पूरी हो जाए, यह जीवन का नियम नहीं है। कुछ इच्छाएँ परिस्थितियों के कारण अधूरी रह जाती हैं, कुछ समय के अभाव में और कुछ इसलिए कि शायद वे हमारे लिए बनी ही नहीं थीं।

लेकिन अधूरी इच्छा को जीवन का अंत मान लेना सबसे बड़ी भूल है।

इसलिए लेखिका कहती हैं—अपनी अधूरी ख्वाहिशों को कूटिए और फिर दृढ़विश्वास के साथ आगे बढ़िए।

अर्थात् असफलता को अपने व्यक्तित्व की पहचान मत बनने दीजिए। जो संभव है, उसके लिए फिर प्रयास कीजिए और जो संभव नहीं, उसे स्वीकार करके आगे बढ़ जाइए।

गुस्सा भी कूट डालिए

सुबह की छोटी-सी झकझक कई बार पूरे दिन का मूड बिगाड़ देती है। एक छोटी बात मन में अटक जाती है और हम उसका असर अपने दूसरे रिश्तों पर भी डालने लगते हैं।

लेखिका यहाँ एक बहुत व्यावहारिक बात कहती हैं—गुस्से को वहीं रोक दीजिए, जहाँ वह पैदा हुआ है।

उसे अपने पूरे दिन और अपने सारे संबंधों में फैलने मत दीजिए।

क्योंकि एक क्षण का क्रोध यदि संभाला न जाए तो वह वर्षों के संबंधों में दरार पैदा कर सकता है।

दगाबाजी को भी कूटिए

जीवन में धोखा देने वाले लोग मिलेंगे। हर व्यक्ति हमारे विश्वास के योग्य नहीं होगा। कुछ लोग हमारी सरलता का लाभ भी उठाएँगे।

लेकिन उनकी गलती का बोझ जीवन भर अपने सिर पर ढोते रहना भी तो स्वयं के साथ अन्याय है।

इसलिए लेखिका का सुझाव है—उनकी दगाबाजी को कूटिए, उसका दर्द बाहर निकालिए, फिर मन बड़ा करके क्षमा कीजिए।

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि गलत को सही मान लिया जाए।

क्षमा का अर्थ है—दूसरे की गलती को अपने भीतर स्थायी विष बनने से रोक देना।

भगवान से शिकायत भी कर लीजिए

इस रचना का यह भाव विशेष रूप से मानवीय है।

ईश्वर पर भी कभी-कभी गुस्सा आता है—

“मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”

“अभी तक यह क्यों नहीं मिला?”

“इतनी कमी क्यों रख दी?”

लेखिका उस शिकायत को भी दबाने के पक्ष में नहीं हैं। वे कहती हैं—भगवान पर भी गुस्सा कर लीजिए।

लेकिन शिकायत के बाद विश्वास मत छोड़िए।

यही इस रचना का आध्यात्मिक संतुलन है—

शिकायत हो सकती है, विश्वास नहीं टूटना चाहिए।

मनुष्य ईश्वर से नाराज़ हो सकता है, लेकिन ईश्वर से अपना संबंध नहीं तोड़ता। शायद यही आस्था का सबसे मानवीय रूप है।

लेखिका की मनःस्थिति

सुषमा अग्रवाल जी की मनःस्थिति इस रचना में एक ऐसी व्यक्ति की दिखाई देती है जिसने जीवन के उतार-चढ़ाव को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे महसूस किया, जिया और उससे कुछ सीखा भी है।

उनके भीतर संवेदनशीलता है, इसलिए चोट भी महसूस होती है; लेकिन उसी के साथ जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टि भी है, इसलिए वे चोट को स्थायी शिकायत नहीं बनने देतीं।

उनकी भाषा में शिकायत है, पर निराशा नहीं।

गुस्सा है, पर कटुता नहीं।

दर्द है, पर पराजय नहीं।

ईश्वर से सवाल है, पर आस्था का अभाव नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लेखिका भावनाओं को दबाने की नहीं, उन्हें स्वस्थ ढंग से बाहर निकालने की बात करती हैं।

शायद इसीलिए ‘अदरक कूटना’ यहाँ एक बेहद सहज और घरेलू प्रतीक बन जाता है।

जैसे अदरक कूटने से उसकी सुगंध बाहर आती है, वैसे ही जीवन की चोटों को समझने और उनसे गुजरने के बाद मनुष्य के भीतर छिपी परिपक्वता, करुणा, क्षमा और जीवन-रस बाहर आ सकता है।

और अंततः पूरी रचना एक छोटी-सी लेकिन बड़ी बात कह जाती है

मन में कुछ जमा हो जाए तो उसे सड़ने मत दीजिए।

कूटिए, मथिए, बाहर निकालिए...

फिर चाय की तरह जीवन को भी गरम, सुगंधित और स्वादिष्ट बनाकर जीते रहिए।

खूब कूटिए अदरक...

और साथ-साथ मन की भड़ास भी।

क्योंकि जिंदगी का स्वाद तभी आता है,

जब मन हल्का हो और चेहरा मुस्कुराता रहे।

सृजक



प्रस्तुति एवं सहयोग











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