एक संस्मरण-पहली राखी की वह प्यारी-सी याद
एक संस्मरण
पहली राखी की वह प्यारी-सी याद
कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर बार याद करने पर मन को उसी मासूमियत से भर देती हैं। मेरे बच्चों की पहली राखी की याद भी ऐसी ही है।
मेरी बेटी तब केवल तीन साल की थी और बेटा अभी एक वर्ष का ही हुआ था। रक्षाबंधन आने वाला था। मैंने बेटी से कहा—“बेटा, राखी आ रही है। तुम्हें अपने छोटे भाई को राखी बाँधनी है।”
बस, फिर क्या था! वह खुशी से फूली नहीं समाई। राखी वाले दिन वह जल्दी-जल्दी तैयार हुई और हाथ में राखी लेकर अपने छोटे भाई के पास पहुँच गई।
लेकिन छोटा भाई भी अपनी ही धुन में था। वह न तो टीका लगवाने को तैयार था और न ही राखी बँधवाने को। जितना उसे मनाया जाए, उतना ही वह मचलता जाए। घर के सभी लोग उसे प्यार से समझाने और मनाने लगे, लेकिन वह अपनी नन्ही-सी जिद पर अड़ा रहा।
आखिरकार जब खेलते-खेलते उसे नींद आने लगी और उसकी आँखें बोझिल होने लगीं, तब किसी तरह उसे सँभालकर मेरी बेटी ने उसके नन्हे हाथ में राखी बाँधी और टीका लगाया।
लेकिन इस पूरे प्रसंग में जो बात मेरे हृदय को सबसे अधिक छू गई, वह मेरी बेटी की मासूम जिद थी।
उसने खाना खाने से साफ मना कर दिया था। वह कहती रही—
“पहले मैं भैया को राखी बाँधूँगी, फिर खाना खाऊँगी।”
उसकी इस छोटी-सी बात में भाई के प्रति कितना स्नेह और अपनापन छिपा था! उसकी मासूमियत देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गए।
आज इतने वर्षों बाद भी वह दृश्य मेरी आँखों के सामने बिल्कुल वैसा ही है—एक नन्ही-सी बहन हाथ में राखी लिए अपने छोटे भाई को मनाने में लगी है और छोटा-सा भाई राखी से बचने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहा है।
बचपन की वे छोटी-छोटी जिदें, वे नन्ही-नन्ही खुशियाँ और रिश्तों में घुला वह निश्छल प्रेम ही तो जीवन की सबसे खूबसूरत पूँजी होते हैं।
समय बीत गया, बच्चे बड़े हो गए, लेकिन वह पहली राखी आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित है।
रक्षाबंधन आते ही वह दिन फिर से आँखों के सामने उतर आता है—
एक नन्ही बहन की चमकती आँखें,
एक छोटे भाई की प्यारी-सी जिद,
और एक माँ की नम आँखें।
शायद इसी का नाम है
बचपन की स्मृतियों में सहेजा हुआ रिश्तों का सबसे सुंदर उत्सव।
सृजक







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