लोक पर्व

छत्तीसगढ़ का लोक-पर्व 'खमरछठ' हल षष्ठी

वात्सल्य, प्रकृति-संरक्षण और वैज्ञानिक पोषण परंपरा का अनुपम संगम

कांसा के बेल अउ, पसहर के चाउर,

चमकत हे बिंदिया, पाँव में माहुर,

हरछठ तिहार के इही पहिचान,

छठी मैय्या के किरपा के करथन बखान 

छत्तीसगढ़ की पावन धरा अपनी समृद्ध लोक-संस्कृति, परंपराओं और पर्वों के लिए जानी जाती है। इन्हीं पर्वों में से एक अत्यंत पावन व्रत है — 'खमरछठ', जिसे भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे प्रदेश में अपार श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। देश के अन्य भागों में इसे'हल षष्ठी', '' या 'हरछठ' कहा जाता है। यह व्रत माताएँ अपनी सन्तान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, रक्षा और सुख-समृद्धि की कामना के लिए पूरी तरह निर्जला रहकर रखती हैं। यह धार्मिक अनुष्ठान के साथ  छत्तीसगढ़ की कृषि-संस्कृति, जैव-विविधता और पोषण विज्ञान का अद्भुत समागम है।

पूजा विधि और लोक परंपरा...

खमरछठ की पूजा का स्वरूप छत्तीसगढ़ी जनजीवन की सादगी औरप्रकृति-प्रेम को दर्शाता है। इस दिन सुबह से ही माताएँ निर्जला व्रत धारण करती हैं। घर के आँगन या मोहल्ले के सार्वजनिक स्थान पर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है, जिसे छत्तीसगढ़ी में 'सगरी' कहा जाता है। सगरी को जल से भरा जाता है और इसके चारों ओर महुआ, कांस (कुश), पलाश तथा लाई-कुश की झाड़ियाँ लगाई जाती हैं। यह  पूजा व्रत को एक प्राकृतिक और पवित्र रूप प्रदान करता है।

पूजा की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि इसमें केवल बिना जुते खेत का अन्न और वनस्पति ही चढ़ाई जाती है। हल से उपजी किसी भी वस्तु का सेवन वर्जित होता है। गाय के दूध, दही और घी का प्रयोग भी पूरी तरह वर्जित रहता है ।केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग किया जाता है।

पूजा सामग्री एवं स्वास्थ्य-पोषण का वैज्ञानिक महत्व...

खमरछठ  के पर्व को यदि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखने पर पता चलता है कि हमारे पूर्वजों ने स्वास्थ्य विज्ञान को धर्म से जोड़कर समाज को निरोगी रखने का मार्ग दिखाया था ...

 व्रत में प्रमुख रूप से जो सामग्रियां प्रयोग की गई है   वह  हमारे स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभदायक है  

पसई चावल (तिन्नी धान) यह बिनाखेत जोते स्वतः उगने वाला प्राकृतिक जंगली चावल है। इसमें लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स  प्रचुर मात्रा में फाइबर, जिंक, आयरन और एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं, जो डायबिटीज नियंत्रण और पाचन के लिए सर्वोत्तम हैं।

छह प्रकार की भाजी...मुनगा, चौलाई, कुम्हड़ा, कांदा, करमत्ता, चेंच आदि यह विटामिन A, C, कैल्शियम और सूक्ष्म पोषक तत्वों का पावरहाउस हैं। मानसून में यह शरीर की इम्युनिटी बढ़ाती हैं।

महुआ का फल व पत्ता दोनों ही प्राकृतिक शक्कर, कैल्शियम और आयरन से भरपूर है। यह स्तनपान कराने वाली माताओं में दूध उत्पादन बढ़ाने का काम करता है।

सतनजा व लाटा यानी  कि सात प्रकार का अनाज यानि कि सात  भुने अनाज और महुआ-तिल का यह मिश्रण शरीर को निर्जला उपवास के बाद तुरंत ऊर्जा देने वाला संतुलित सुपाच्य आहार है।

सभी सामग्रियों को एकत्र कर  महिलाएं एकत्रित होकर सगरी  के पास बैठती हैं और महुआ की डगाल हाथ में लेकर मुख्य रूप से ग्वालिन की कहानी सुनती हैं।

कथा और पूजा के समापन के बाद, माताएँ महुए के पत्ते पर भैंस का दूध-दही रखकर उससे अपनी सन्तान की पीठ और माथे पर 'पोछा' (तिलक) लगाती हैं। यह रिवाज प्रतीकात्मक रूप से बच्चे को सभी विघ्न-बाधाओं और बीमारियों से बचाने का सुरक्षा-कवच माना जाता है।

इसके पश्चात सगरी की परिक्रमा की जाती है और शाम को केवल पसई चावल के भात, भैंस के घी में पकाई गई छह भाजियों और महुआ का सेवन करके व्रत का पारण किया जाता है। इस प्रकार खमरछठ का पर्व छत्तीसगढ़ी माताओं के त्याग, वात्सल्य, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक स्वास्थ्य की जीवंत मिसाल प्रस्तुत करता है।

प्रस्तुति











सृजक

सीमा पाण्डेय सीमा 

लेखिका/कवयित्री/स्तंभकार/स्थानीय संपादिका (उलझन सुलझन) रायपुर महिला प्रकोष्ठ








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