तू ही बनना बस मेरा भाई..

तू ही बनना बस मेरा भाई..

भूमिका

इस कविता में राखी का धागा केवल भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक नहीं, बल्कि उस विराट रिश्ते का भी प्रतीक बन जाता है जिसमें रक्त का संबंध पीछे छूट जाता है और राष्ट्र सर्वोपरि हो जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक जब हर भारतीय बहन की रक्षा का संकल्प निभाता है, तब उसकी कलाई पर बंधा रक्षासूत्र एक बहन की राखी से बढ़कर पूरे देश की भावनाओं का भार सँभालता है। लेकिन जब वही भाई तिरंगे में लिपटकर घर लौटता है, तो राखी का उत्सव करुणा में बदल जाता है। आइए, इसी प्रेम, त्याग और देशभक्ति से भीगी इस मार्मिक रचना को पढ़ें।

काव्य रचना

तू ही बनना बस मेरा भाई



देश की सीमा पर खड़ा है भाई,
बहन सजा रही उसकी कलाई।
तिलक लगाकर करे आरती,
खुश हो रही माँ भारती।

सहोदर नहीं तो क्या हुआ,
देश का है वो अगोदर भाई।
अपने इसी कर्तव्य को निभाने,
डटा है सीमा पर बन के सिपाही।

रक्षा बंधन पर भेजे बहना,
प्यार-दुलार और ढेरों आशीष।
दुश्मन की गोली से करेंगे रक्षा,
बहना के भेजे ये रक्षासूत्र।

सारे भारत की बहनें हैं उसकी,
सबकी रक्षा का भार है उस पर।
हँसते-हँसते बहन के लिए,
भाई ने अपनी जान गँवाई।

डोली में बिठा कर करूँगा बिदा,
जिसने कभी ये कसम थी खाई।
ताबूत में बंद हो पहुँचा जब घर,
बहन ना रोक सकी अपनी रुलाई।

उठी अर्थी आज उसी के घर से,
देशप्रेम की जिसने अलख जगाई।
भरे दिलों से, ऊँचे मस्तक से,
दे रहे सब उसको अंतिम विदाई।

दुआ निकल रही हर बहना के दिल से—
अगले जनम में तू ही बनना बस मेरा भाई...

तू ही बनना बस मेरा भाई..

सुषमा अग्रवाल

                               नागपुर (महाराष्ट्र) 

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