सुकून हमारे आस-पास ही है!
सुकून हमारे आस-पास ही है!
भूमिका
हमारी तेज होती दिनचर्या ने जीवन में सुविधाएँ तो बहुत बढ़ा दी हैं, लेकिन ठहरने के अवसर कम कर दिए हैं। जिम्मेदारियों के बीच मन जब थकने लगता है तो हमें लगता है कि सुकून शायद किसी दूर स्थान पर मिलेगा—किसी यात्रा में, किसी शांत शहर में या रोजमर्रा की दुनिया से कुछ समय दूर जाकर। किंतु क्या सचमुच शांति इतनी दूर है? शायद नहीं। कई बार वह हमारे आसपास ही होती है; आवश्यकता केवल इतनी है कि हम भागती हुई दिनचर्या के बीच कुछ क्षण ठहरें और उसे महसूस करें।
आलेख
कभी-कभी दिनभर की जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते ऐसा लगता है जैसे बाहर की भागदौड़ के साथ मन के भीतर भी कोई लंबी यात्रा चल रही हो। घर वही रहता है, लोग वही रहते हैं, काम भी वही रहते हैं, लेकिन भीतर कहीं एक अनकही थकान धीरे-धीरे अपना स्थान बना लेती है।
ऐसे क्षणों में मन चाहता है कि सब कुछ कुछ देर के लिए छोड़ दिया जाए और किसी दूर स्थान की ओर निकल पड़ा जाए। किसी ऐसे स्थान पर, जहाँ सुबह अलार्म की आवाज से नहीं, पक्षियों की चहचहाहट से हो; जहाँ हवा केवल मौसम का एहसास न कराए, बल्कि किसी अपने के स्नेहिल स्पर्श जैसी लगे; जहाँ दुनिया का शोर कुछ देर पीछे छूट जाए और मन अपनी ही धड़कनों को सुन सके।
लेकिन जीवन के अनुभव धीरे-धीरे एक दूसरी बात समझाते हैं—सुकून हमेशा किसी दूर की यात्रा में नहीं मिलता। कई बार वह वहीं मौजूद होता है, जहाँ हम रोज जाते हैं, जिसे रोज देखते हैं और जिसके महत्व को अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
गौशाला जाना मेरे लिए ऐसे ही अनुभवों में से एक है।
वहाँ पहुँचते ही लगता है जैसे शहर की भागती हुई घड़ी कुछ देर के लिए अपनी गति धीमी कर देती है। ऊपर खुला आकाश, हवा के साथ झूमती पेड़ों की शाखाएँ और पत्तियों की सरसराहट—इन सबके बीच दिनभर का शोर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है। प्रकृति कोई भाषण नहीं देती, फिर भी वह बहुत कुछ कह जाती है।
कभी धूप पत्तियों के बीच से छनकर जमीन पर छोटे-छोटे उजले टुकड़े बना देती है। उन टुकड़ों को देखकर सहज ही लगता है कि प्रकाश का सुंदर होना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह कितना व्यापक है; कभी-कभी थोड़ी-सी रोशनी भी पर्याप्त होती है।
शायद मनुष्य के जीवन में भी ऐसा ही है। हर समय सब कुछ ठीक होना जरूरी नहीं। हर परिस्थिति में पूरी स्पष्टता मिलना भी आवश्यक नहीं। कई बार थोड़ी-सी उम्मीद ही आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त होती है।
फिर अचानक कबूतरों का झुंड फड़फड़ाकर उड़ता है और कुछ क्षणों के लिए पूरा आकाश जीवंत हो उठता है। थोड़ी देर बाद वही पक्षी किसी छज्जे या मुंडेर पर लौटकर बैठ जाते हैं। उनकी उड़ान और वापसी दोनों अपने भीतर एक सहज संदेश लिए होती हैं—उड़ना जीवन का हिस्सा है, लेकिन लौटने के लिए एक ठिकाना होना भी उतना ही आवश्यक है।
मनुष्य भी शायद इसी संतुलन की तलाश में रहता है। वह आगे बढ़ना चाहता है, दूर तक जाना चाहता है, अपनी सीमाओं से बाहर निकलना चाहता है; लेकिन अंततः उसे किसी ऐसे स्थान की आवश्यकता होती है जहाँ वह स्वयं होकर लौट सके।
पास ही खरगोशों की चंचलता दिखाई देती है तो मन की गंभीरता कुछ हल्की हो जाती है। उनकी छोटी-सी दुनिया में भी जीवन कितना सहज और पूर्ण दिखाई देता है। तब मन में प्रश्न उठता है—हमारी दुनिया जितनी बड़ी होती गई, हमारा सुकून उतना ही छोटा क्यों होता गया?
गौशाला में खड़ी गायों की शांत आँखों में भी एक अलग तरह की शिक्षा दिखाई देती है। वहाँ न जल्दबाजी है, न प्रदर्शन और न ही लगातार कुछ साबित करने की बेचैनी। वे बस अपने वर्तमान में होती हैं।
शायद यही वर्तमान में होना हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हम अक्सर बीते हुए कल की चिंता और आने वाले कल की तैयारी में आज को ही पीछे छोड़ देते हैं। जबकि जीवन वास्तव में उसी क्षण में घट रहा होता है, जिसमें हम उपस्थित हैं।
प्रकृति का एक और दृश्य मन को छूता है—हवा के साथ जमीन पर सरकता कोई सूखा पत्ता। वह कभी शाखा का हिस्सा था, फिर समय आया और वह उससे अलग हो गया। हवा उसे कुछ दूर तक अपने साथ ले जाती है और अंततः वह चुपचाप जमीन पर ठहर जाता है।
पत्ता शिकायत नहीं करता।
शायद प्रकृति हमें यहाँ भी एक महत्वपूर्ण बात सिखाती है—हर चीज को हमेशा पकड़े रखना आवश्यक नहीं। कुछ संबंध, कुछ अपेक्षाएँ, कुछ स्मृतियाँ और कुछ परिस्थितियाँ समय के साथ हमसे अलग होती हैं। उन्हें स्वीकार कर आगे बढ़ना भी जीवन का हिस्सा है।
मिट्टी की सौंधी खुशबू तो जैसे स्मृतियों का कोई पुराना द्वार खोल देती है। बारिश के बाद भीगी मिट्टी से उठती खुशबू बचपन, घर, आँगन और उन दिनों की याद दिला देती है जब जीवन शायद इतना जटिल नहीं था।
मिट्टी बोलती नहीं, फिर भी बहुत कुछ कहती है—थक जाओ तो लौट आओ; अपनी जड़ों से जुड़ना मत भूलो।
यही शायद प्रकृति की सबसे बड़ी खूबसूरती है। वह हमारी समस्याओं को समाप्त करने का दावा नहीं करती। वह हमारे जीवन की परिस्थितियाँ नहीं बदलती। लेकिन वह हमें उन परिस्थितियों के बीच स्वयं को सँभालने की क्षमता अवश्य देती है।
प्रकृति के बीच बिताए कुछ पल इसलिए मूल्यवान हैं कि वहाँ समस्याएँ गायब नहीं होतीं, लेकिन उन्हें देखने का हमारा दृष्टिकोण बदलने लगता है।
घर लौटने पर वही जिम्मेदारियाँ होती हैं, वही काम होते हैं और वही जीवन होता है। फर्क केवल इतना होता है कि मन के भीतर एक छोटा-सा शांत कोना बन चुका होता है—जहाँ कुछ देर बिना किसी भूमिका, बिना किसी अपेक्षा और बिना किसी प्रदर्शन के स्वयं के साथ बैठा जा सकता है।
यही सुकून का वास्तविक अर्थ हो सकता है।
जीवन से भाग जाना नहीं, बल्कि जीवन में लौटने से पहले स्वयं को थोड़ा थाम लेना।
इसलिए सुकून के लिए हमेशा किसी दूर देश की तलाश आवश्यक नहीं। कभी नर्सरी की हरियाली में पौधों को बढ़ते देखना, कभी गौशाला में पशुओं की शांत आँखों में झाँकना, कभी कबूतरों की उड़ान को देखना, कभी खरगोशों की चंचलता पर मुस्कुरा देना और कभी पेड़ों से छनती धूप को हथेली पर महसूस कर लेना भी अपने आप में एक छोटी-सी यात्रा है।
ऐसी यात्राओं की विशेषता यह है कि इनमें हम दुनिया से दूर नहीं जाते, बल्कि अपने भीतर लौटते हैं।
शायद सुकून कोई मंजिल नहीं है। वह हवा की तरह है—दिखाई नहीं देता, फिर भी छू जाता है। वह मिट्टी की खुशबू की तरह है—पकड़ा नहीं जा सकता, फिर भी भीतर तक उतर जाता है। वह पक्षी की उड़ान की तरह है—कुछ पल दिखाई देता है और फिर खुले आकाश में विलीन हो जाता है।
सुकून शायद किसी एक स्थान में नहीं रहता। वह हमारे अनुभवों, प्रकृति के छोटे-छोटे स्पर्शों और उन क्षणों में छिपा होता है, जब हम अपने भीतर की आवाज सुनने के लिए बाहरी शोर से थोड़ी दूरी बना लेते हैं।
जरूरत केवल इतनी है कि जीवन की गति के बीच हम कुछ क्षण ठहरना सीखें।
क्योंकि कई बार जिस सुकून की तलाश में हम दूर निकल जाना चाहते हैं, वह हमारे आसपास ही चुपचाप मौजूद होता है।
बस मन को थोड़ा शांत करना होता है, ताकि उसकी आहट सुनाई दे सके।
प्रकृति से रूबरू सृजक
सृजक
सरोज प्रसाद राय
प्रस्तुति















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