काश! लौट आए वो पल

काश! लौट आए वो पल


बरामदे में बैठी आरोही बारिश को देख रही थी।

आसमान से गिरती बूँदें जैसे आज फिर उसे बरसों पीछे ले जा रही थीं।

टेबल पर चाय का प्याला रखा था और सामने गरम पकौड़ों की प्लेट। सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसे पसंद था… फिर भी कुछ बहुत जरूरी चीज़ नहीं थी।

माँ नहीं थी।

आरोही ने धीरे से एक पकौड़ा उठाया। स्वाद अच्छा था, लेकिन उसे माँ के हाथों की वह बात कहाँ?

उसे याद आया—बचपन में जैसे ही बारिश शुरू होती, वह खिड़की से चिल्लाती—

“माँ! बारिश आ गई!”

माँ रसोई से हँसते हुए कहतीं,

 “अच्छा, अब मेरी बिटिया को पकौड़े चाहिए।”

और फिर चाय-पकौड़ों का दौर शुरू हो जाता।

आरोही पढ़ने बैठती तो माँ बार-बार उसके पास आकर पूछतीं,

“थक तो नहीं गई?”

“नहीं माँ।”

“झूठ मत बोल। चल, पहले कुछ खा ले।”

माँ उसकी आँखों को पढ़ लेती थीं। उसे क्या चाहिए, क्या अच्छा नहीं लग रहा, किस बात की चिंता है—उसे बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

समय बीतता गया।

आरोही बड़ी हुई, पढ़ाई पूरी की और अपने सपने को पूरा करने के लिए दूसरे शहर चली गई। एक दिन उसने डॉक्टर की सफेद कोट पहनकर माँ के सामने खड़े होकर कहा—

“देखो माँ, अब मैं डॉक्टर बन गई।”

माँ की आँखों में आँसू आ गए।

उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

“अब अगर मैं बीमार पड़ूँगी तो मेरा इलाज कौन करेगा?”

आरोही हँस पड़ी।

“मैं करूँगी ना माँ!”

माँ ने मुस्कुराकर कहा,

“बस, मेरी यही इच्छा है।”

आरोही ने सचमुच अपनी पूरी जिंदगी मरीजों की सेवा में लगा दी। नाम मिला, सम्मान मिला, पुरस्कार मिले… लेकिन जब भी वह अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि के बारे में सोचती, उसे माँ का वही मुस्कुराता चेहरा दिखाई देता।

एक दिन अस्पताल में उसका फोन बजा।

घर से खबर थी—माँ की तबीयत बहुत खराब है।

आरोही सब कुछ छोड़कर निकल पड़ी।

रास्ते भर उसके मन में बस एक ही प्रार्थना थी—

“हे भगवान! इस बार मुझे देर मत करवाना।”

लेकिन अस्पताल पहुँचते-पहुँचते बहुत देर हो चुकी थी।

माँ जा चुकी थीं।

आरोही कुछ पल तक उन्हें देखती रही। उसकी आँखों के सामने जैसे पूरा बचपन घूम गया—माँ की आवाज़, उनके हाथों का खाना, बारिश की शामें, डाँट, दुलार और वह वादा…

“माँ, मैं तुम्हारा इलाज करूँगी।”

उस दिन पहली बार उसे लगा कि दुनिया की सारी पढ़ाई, सारी डिग्रियाँ और सारे पुरस्कार उसके सामने बहुत छोटे हैं।

वह माँ को नहीं बचा सकी थी।

घर लौटी तो पिता चुपचाप एक कोने में बैठे थे। जिस घर में माँ की आवाज़ गूँजती थी, वहाँ अब खामोशी पसरी थी।

रसोई में रखी पुरानी कड़ाही देखकर आरोही की आँखें भर आईं।

उसने उसे उठाया, साफ किया और उसी शाम पकौड़े बनाए।

पिता जी ने पूछा—

“बेटा, आज पकौड़े क्यों?”

आरोही मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली—

“बारिश हो रही है ना पापा…”

दोनों चुप हो गए।

पकौड़े सामने थे, चाय भी थी… लेकिन माँ नहीं थीं।

आरोही ने एक निवाला खाया और उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

पिता ने धीरे से कहा—

“स्वाद तो अच्छा है बेटा… पर तेरी माँ जैसा नहीं।”

दोनों की आँखें नम हो गईं।

उस दिन आरोही समझ गई कि कुछ रिश्ते हमारे जीवन से चले जाते हैं, लेकिन हमारी स्मृतियों से कभी नहीं जाते।

आज भी जब बारिश होती है, आरोही पकौड़े बनाती है। चाय बनाती है। बरामदे में बैठती है।

और कभी-कभी उसे लगता है, जैसे माँ पीछे से आकर कह रही हों—

“इतनी बारिश में बाहर मत बैठ, सर्दी लग जाएगी।”

वह पलटकर देखती है…

वहाँ कोई नहीं होता।

सिर्फ बारिश होती है।

सिर्फ यादें होती हैं।

और मन में एक अधूरी-सी पुकार—

“काश लौट आए वो पल…

 जब माँ थी, बचपन था और जिंदगी इतनी खूबसूरत थी।”

लेकिन बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता।

वह बस याद बनकर हमारे भीतर रह जाता है…

और जब-जब आँखें बंद होती हैं, वही यादें हमें फिर से माँ की गोद में ले जाती हैं। ❤️

प्रस्तुति









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