नाग पंचमी… नाग, डू नॉट पंच मी!
नाग पंचमी…
नाग, डू नॉट पंच मी!
भूमिका
नाग पंचमी केवल नागों की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, जीव-जंतुओं और मनुष्य के बीच सह-अस्तित्व की भारतीय भावना का प्रतीक भी है। वर्षा ऋतु में जब साँप अपने बिलों में पानी भर जाने के कारण सुरक्षित स्थान की तलाश में बाहर निकलते हैं, तब उनके प्रति भय के बजाय सम्मान और संवेदना का भाव रखने की परंपरा इस पर्व को विशेष अर्थ देती है। नागों के प्रति आदर, उनसे सुरक्षा की कामना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता—इन सभी भावों को एक साथ समेटे नाग पंचमी भारतीय लोकजीवन और परंपराओं से गहराई से जुड़ा पर्व है।
आलेख
नाग पंचमी… नाग, डू नॉट पंच मी!
नाग पंचमी का पर्व नागों के प्रति आदर, सम्मान और उनसे हमारी सुरक्षा की कामना को अभिव्यक्त करता है। इसे सहज भाव से अंग्रेज़ी में कहें तो संदेश बनता है—“Nag, Do Not Punch Me!” अर्थात् नाग, मुझे डँसना मत!
दरअसल, वर्षा ऋतु में साँपों के बिलों में पानी भर जाने के कारण वे अक्सर बाहर निकल आते हैं। ऐसे समय में मनुष्य और नाग का आमना-सामना होने की संभावना बढ़ जाती है। संभवतः इसी प्राकृतिक परिस्थिति ने नाग पंचमी जैसे पर्व को लोकजीवन में विशेष स्थान दिया।
नाग पंचमी का पर्व सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। कई क्षेत्रों में नाग पूजा से जुड़ी स्थानीय परंपराएँ और तिथियाँ अलग-अलग रूपों में भी प्रचलित हैं।
अग्रवाल समाज की लोकपरंपराओं में नागवंश से उनके घनिष्ठ संबंध का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि महाराजा अग्रसेन ने नागराज की पुत्री माधवी से विवाह किया था। इसी कारण अग्रवाल समाज की कुछ परंपराओं में नागों को मामा पक्ष से जोड़ा जाता है।
विवाह संस्कारों में भी इस संबंध की सांस्कृतिक छाप दिखाई देती है। विवाह के अवसर पर चढ़ाए जाने वाले छत्र की चुनरी को सर्प के फन के आकार में सजाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। नागवंश को मातृकुल मानने की इसी लोकमान्यता से जुड़ी थापा और सिरगुथी जैसी रस्मों में भी कन्या द्वारा फन के आकार की चूड़ी, चुनरी और चाँबरी धारण करने की परंपरा बताई जाती है।
त्योहारों और विवाह संस्कारों में नागों के प्रतीक सदियों से पूजनीय रहे हैं। हाथों के छापों, पूजा स्थलों तथा घर के द्वार पर नागों के चित्र बनाए जाते हैं। ये चित्र केवल पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि नागों के प्रति सम्मान, संरक्षण और शुभकामना की लोकभावना को भी अभिव्यक्त करते हैं।
लोकमान्यता यह भी है कि नाग पंचमी के दिन बहन-बेटियों को अवश्य पीहर बुलाना चाहिए। इस परंपरा में केवल एक धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि मायके और बेटी के बीच स्नेह, अपनत्व और पारिवारिक संबंधों को जीवित रखने का भाव भी निहित है।
इस प्रकार नाग पंचमी हमें केवल नागों की पूजा करना नहीं सिखाती, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रकृति में हर जीव का अपना महत्व है। भय के स्थान पर सह-अस्तित्व और हिंसा के स्थान पर संवेदना ही हमारी सच्ची संस्कृति है।
रचनाकार और प्रस्तुति






Comments
Post a Comment