विजयदान देथा की कहानियों में धड़कता है हमारा राजस्थान


विजयदान देथा की कहानियों में धड़कता है हमारा राजस्थान

— डॉ. सत्यनारायण

साथियो,

विजयदान देथा को याद करना केवल एक साहित्यकार को याद करना नहीं है। उनका स्मरण उस लोक को याद करना है, जिसके भीतर कितनी ही कथाएँ गुँथी हुई हैं। उनका चलना, दरअसल, भाषा का चलना था। उन्होंने लोक के भीतर से अनगिनत कहानियों को खोजा, उनके मूलरूप को बरकरार रखते हुए उन्हें अपने ढंग से लिखा और राजस्थानी भाषा को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।

इन कथाओं में एक जादुई स्पर्श है, जहाँ पशु-पक्षी भी मानवीय व्यवहार करते हैं। लोक में प्यार से ‘बिज्जी’ और साहित्यकार के रूप में विजयदान देथा के नाम से ख्यात इस लेखक का जन्म जोधपुर के बोरूंदा गाँव में सितंबर 1926 में हुआ। उनके पिता सबलदान जी स्वयं काव्य-रचना कौशल में निपुण थे। बिज्जी की प्रारंभिक शिक्षा जैतारण और उच्च शिक्षा जोधपुर में हुई।

बी.ए. के दौरान ही ‘उषा’ शीर्षक से उनका कविता-संग्रह छप चुका था। लेकिन बाद में बिज्जी ने ऐसी भाषा में लिखना तय किया, जो भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त आधिकारिक भाषाओं में शामिल नहीं थी। वर्ष 1959 में उन्होंने विधिवत लेखक बनने का निर्णय लिया और बोरूंदा आ गए। यहाँ वे लोककथाओं को अपनी भाषा में लिखने लगे।

हालाँकि, यह जोखिम भरा निर्णय था। वे पार हुए—अकेले नहीं, अपनी भाषा के साथ। बिज्जी के विपुल साहित्य को देखते हुए साहित्य अकादमी ने राजस्थानी में भी पुरस्कार देने का निर्णय लिया और 1974 में पहला पुरस्कार विजयदान देथा की पुस्तक ‘बातां री फुलवारी’ को मिला।

हिंदी में ‘दुविधा’, ‘उलझन’ और ‘अंतराल’ उनके कहानी-संग्रह हैं, तो ‘महामिलन’ और ‘प्रतिशोध’ उनके उपन्यास हैं। बिज्जी की कहानी ‘दुविधा’ पर मणि कौल ने इसी शीर्षक से फिल्म बनाई। इसी कहानी पर आगे चलकर ‘पहेली’ फिल्म भी बनी।

बिज्जी ने बोरूंदा में कोमल कोठारी के साथ मिलकर रूपायन संस्थान की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य लोककथाओं के साथ कला और संगीत का दस्तावेजीकरण करना था। संस्थान की अपनी प्रेस थी, जिसमें ‘बातां री फुलवारी’ और अन्य रचनाओं के प्रकाशन के साथ ‘लोक संस्कृति’ और ‘प्रेरणा’ जैसी पत्रिकाएँ भी उनके संपादन में निकलती थीं।

‘रूपायन’ में 1960 से उनकी सेवा में रहे डगलाराम ने बताया कि बिज्जी शब्द के प्रति इतने समर्पित थे कि कई बार अचानक कुछ कौंधता, तो वे आपा भूल जाते। एक बार जब उनके नहाने के लिए पानी की बाल्टी लाने में थोड़ी देर हो गई, उसी समय उनके दिमाग में कुछ लिखने का विचार कौंधा। वे बिना कपड़ों के ही दौड़कर टेबल पर लिखने बैठ गए।

बिज्जी को वर्ष 2007 में पद्मश्री सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार और साहित्य अकादमी का सर्वोच्च साहित्य अकादमी फैलोशिप सम्मान तथा बिहारी पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2011 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद वे भारत के पहले ऐसे साहित्यकार थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

एक प्रसंग मुझे आज भी याद आता है। लू के तपते दिन थे। बोरूंदा बस स्टैंड पर चाय वाले दिनेश प्रजापत ने वहाँ खड़े पवन से यूँ ही पूछ लिया—

“बिज्जी ने जाणो?”

तपाक से बोले—

“साब, कुणकोनी जाणे? सारा देश में बोरूंदा को नाम करयो।”

लेकिन आज रूपायन संस्थान में बिज्जी की कोई निशानी नहीं थी।

अंतिम समय में जब बिज्जी देखने, पढ़ने और लिखने में अशक्त हो गए थे, तब भी वे किताब के पन्नों को अपनी अंगुलियों से छूते, टटोलते थे। मालचंद तिवाड़ी की ‘बोरूंदा डायरी’ में अप्रतिम बिज्जी के विदा-गीत में लिखा है—

“बिज्जी को लिखने के सिवा किसी चीज से मोह नहीं था।”

कोई बोर्ड नहीं था। लक्ष्मणसिंह देवल और मोहन जी ने लोकऋषि के संजोए शब्द-सागर को ताला खोलकर, धूल झाड़ते हुए दिखाया। मेरे लिए यह पीड़ादायी था कि बिज्जी को अपनी किताबों के लिए अलग से कोई अलमारी नहीं थी।

‘रूपायन’ प्रेस से छपी ‘बातां री फुलवारी’ और अन्य पुस्तकें खुली रैक में रेत की परत से दबी थीं। वह कुर्सी, जिस पर बैठकर साठ के दशक में धूल भरी आँधियों के दिनों में वे रेत से निकालकर लोककथाओं को तरतीब देते रहे होंगे, आज सूनी थी।

कुर्सी की पीठ पर एक तौलिया था, जो कभी सफेद रहा होगा, अब रेतिया था। मैंने कुर्सी के दोनों हत्थों को छुआ। कुछ वैसे ही, जैसे बिज्जी को नमन कर उनके दोनों हाथों को अपने माथे पर रख लेता था।

मैं वहाँ से लौट आया।

कुर्सी क्या बोलती?

जबकि बिज्जी होते, तो कहते—

“कांई बावली बात करै!”

— डॉ. सत्यनारायण
साहित्यकार

संपादकीय टिप्पणी: ऊपर का पाठ दैनिक भास्कर से साझा की गई मूल कतरन के आशय और कथ्य पर आधारित है। इसमें मुख्यतः विराम-चिह्न, अनुच्छेद-विन्यास, वर्तनी, वाक्य-प्रवाह और प्रथम-पुरुष संबोधन को व्यवस्थित किया है; मूल कतरन में दिए ऐतिहासिक/पुरस्कार संबंधी तथ्यों का स्वतंत्र तथ्य-परीक्षण इसमें नहीं किया गया है।

आधारक

 

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