उलझन सुलझन का श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेषांक
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर मुख्य आलेख
राधा-कृष्ण : सृष्टि, प्रेम और महारास का अंतरंग सत्य
✍️ देव चेतना
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है। यह प्रेम, आनंद, चेतना और आत्मबोध के जागरण का पर्व भी है। श्रीकृष्ण का स्मरण श्रीराधा के बिना और श्रीराधा का स्मरण श्रीकृष्ण के बिना अधूरा है।
राधा-कृष्ण को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल स्त्री और पुरुष के रूप में देखना उनके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है। वे प्रकृति और पुरुष, शक्ति और शक्तिमान, प्रेम और चेतना के युगल तत्व के प्रतीक हैं।
इसीलिए राधा-कृष्ण की लीला को समझने के लिए उसके बाहरी रूप से आगे बढ़कर उसके अंतरंग अर्थ को समझना आवश्यक है।
सृष्टि का मूल : एक से अनेक
भारतीय दर्शन में सृष्टि के संबंध में एक गहरी कल्पना मिलती है—“एकोऽहं बहुस्याम्” अर्थात् एक से अनेक होने का भाव।
एक मूल चेतना जब विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है तो सृष्टि का विस्तार दिखाई देता है। इसी को प्रकृति और पुरुष, शिव और शक्ति तथा अर्धनारीश्वर जैसे प्रतीकों के माध्यम से समझाया गया है।
अर्धनारीश्वर यह संकेत देता है कि सृष्टि में चेतना और शक्ति अलग-अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
इसी युगल तत्व की प्रेममयी अभिव्यक्ति हमें राधा-कृष्ण में दिखाई देती है।
कृष्ण परम चेतना और आनंद के प्रतीक हैं, तो राधा उस चेतना की प्रेममयी और आह्लादिनी शक्ति का प्रतीक हैं।
इसलिए—
राधा कृष्ण से अलग नहीं हैं और कृष्ण राधा से अलग नहीं हैं।
‘रसो वै सः’ : आनंद ही परम सत्य का संकेत
उपनिषदों में कहा गया है—“रसो वै सः”। भारतीय दर्शन में परम सत्य को सत्-चित्-आनंद स्वरूप माना गया है।
‘रस’ को यहाँ केवल स्वाद या सुख के सामान्य अर्थ में नहीं समझना चाहिए। रस वह गहरी अनुभूति है, जिसमें मनुष्य किसी भाव को केवल जानता नहीं, बल्कि उसे भीतर से जीता है।
लौकिक जीवन में आकर्षण और इंद्रियजन्य सुख का संबंध कामना से हो सकता है, लेकिन जब प्रेम स्वार्थ, अधिकार और केवल देह की सीमा से ऊपर उठकर आत्मिक आनंद बन जाता है, तब वह अलौकिक प्रेम का रूप लेने लगता है।
राधा-कृष्ण इसी अलौकिक प्रेम के प्रतीक हैं।
राधा : कृष्ण की प्रेममयी शक्ति
राधा को कृष्ण की शक्ति, सिद्धि और आह्लादिनी शक्ति के रूप में समझा गया है।
यदि कृष्ण आनंद का आधार हैं तो राधा उस आनंद की अनुभूति हैं। यदि कृष्ण चेतना हैं तो राधा उस चेतना का प्रेममय स्पंदन हैं।
यही कारण है कि राधा-कृष्ण का संबंध केवल प्रेमी-प्रेमिका का संबंध नहीं रह जाता। वह प्रेम और परम चेतना के एकत्व का प्रतीक बन जाता है।
प्रेम की चरम अवस्था में प्रेमी अपने प्रिय के भाव में और प्रिय प्रेमी के भाव में उतर जाता है। बाहरी रूप नहीं बदलता, लेकिन भीतर की अनुभूति बदल जाती है।
यही तद्रूपता है—अपने प्रिय के भाव में रंग जाना।
रासलीला का वास्तविक अर्थ
श्रीकृष्ण की ब्रजलीला में रास का विशेष महत्व है। रासलीला को केवल लौकिक दृष्टि से देखने पर उसका आध्यात्मिक अर्थ छूट सकता है।
महारास में श्रीकृष्ण केंद्र में हैं और उनके चारों ओर गोपियाँ हैं। इसे प्रतीकात्मक रूप में देखें तो कृष्ण परम चेतना हैं और गोपियाँ उन जीवात्माओं का प्रतीक हैं, जो अपने मूल स्रोत की ओर आकर्षित हैं।
कृष्ण प्रत्येक गोपी के साथ हैं। इसका संकेत यह हो सकता है कि परम चेतना किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सभी के भीतर समान रूप से विद्यमान है।
प्रत्येक गोपी को अपना कृष्ण दिखाई देता है, लेकिन कृष्ण की चेतना सबमें एक ही है।
इस दृष्टि से महारास परम सत्ता की अपने ही विविध स्वरूपों के साथ लीला का प्रतीक बन जाता है।
जैसे दर्पण में मनुष्य अपनी ही छवि को देखकर उससे संवाद करता है, वैसे ही यह जगत भी परम चेतना की विविध अभिव्यक्तियों का विराट दर्पण माना जा सकता है।
हमारा हृदय ही वृंदावन
रासलीला को केवल बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है।
हमारा हृदय भी वृंदावन
उसमें प्रेम की यमुना बहती है, श्रद्धा के कुंज हैं और उसी अंतरंग भूमि में आत्मा अपने परम प्रिय की खोज करती है।
आत्मा की जो वृत्ति निरंतर परम चेतना की ओर उन्मुख रहती है, उसे राधा-भाव के रूप में समझा जा सकता है। मन की अन्य वृत्तियाँ गोपियों के समान हैं, जो अंततः उसी चेतना की ओर आकर्षित होती हैं।
इस निरंतर आत्मिक आकर्षण और परम प्रिय में लीन होने की प्रक्रिया को अंतरंग रास कहा जा सकता है।
अर्थात् रास केवल ब्रज की भूमि पर घटित लीला नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाली प्रेम और चेतना की यात्रा भी है।
प्रेम की दो अवस्थाएँ : संयोग और विरह
प्रेम केवल मिलन में नहीं होता। उसमें संयोग और विप्रयोग, दोनों का अपना महत्व है।
संयोग प्रिय की उपस्थिति का आनंद देता है, जबकि विरह प्रिय की अनुपस्थिति में उसकी उपस्थिति को और गहरा कर सकता है।
राधा का कृष्ण-विरह इसी भाव का प्रतीक है। दूरी के बावजूद कृष्ण का स्मरण भीतर और अधिक प्रखर होता जाता है।
इसलिए प्रेम का अर्थ केवल साथ होना नहीं; कभी-कभी स्मरण, प्रतीक्षा और विरह भी प्रेम को उसकी गहराई प्रदान करते हैं।
प्रेम जब भक्ति बनता है
प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं कि हमें उससे कितना मिलता है, बल्कि यह है कि हम उसमें कितना समर्पित हो पाते हैं।
जहाँ अधिकार कम और स्वीकार अधिक हो, वहाँ प्रेम निर्मल होता है।
जहाँ स्वार्थ कम और आत्मीयता अधिक हो, वहाँ प्रेम गहरा होता है।
जहाँ अहंकार कम और समर्पण अधिक हो, वहाँ प्रेम भक्ति बन जाता है।
भक्त और भगवान का संबंध भी इसी अंतरंगता का प्रतीक है।
जब भक्त अपने आराध्य में इतना लीन हो जाता है कि उसका ‘मैं’ पीछे छूटने लगता है, तब भक्ति केवल पूजा-पद्धति नहीं रहती; वह अनुभूति बन जाती है।
इसीलिए कहा जा सकता है—
प्रेम समर्पण बने तो भक्ति है,
भक्ति गहरी हो तो साधना है,
और साधना भीतर के सत्य का बोध करा दे तो आत्मबोध है।
युगल तत्व से अद्वैत तक
मनुष्य जीवनभर पूर्णता की तलाश करता है। वह संबंधों में प्रेम, आत्मीयता और अपनेपन को खोजता है। यह खोज केवल दूसरे व्यक्ति की खोज नहीं, बल्कि अपने भीतर के अधूरेपन को समझने की यात्रा भी है।
स्त्री-पुरुष संबंध भी इसी युगल तत्व का एक लौकिक रूप हो सकता है। किंतु उसका अंतिम अर्थ केवल देह तक सीमित नहीं है।
जब दो व्यक्तियों के बीच प्रेम इतना गहरा हो जाए कि दोनों एक-दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करते हुए अपने अहंकार को पीछे छोड़ दें, तब संबंध में एक नई आत्मीयता जन्म लेती है।
यहीं से द्वैत से अद्वैत की अनुभूति की दिशा खुलती है।
राधा-कृष्ण का युगल हमें इसी सत्य की ओर संकेत करता है।
जीवन ही एक महारास
यदि जीवन को केवल प्रतिस्पर्धा, उपलब्धि और प्राप्ति की दौड़ माना जाए तो तनाव बढ़ता है।
लेकिन यदि जीवन को एक विराट महारास की तरह देखा जाए—जहाँ प्रत्येक व्यक्ति उसी व्यापक चेतना की एक अभिव्यक्ति है—तो हमारी दृष्टि बदल सकती है।
तब तुलना की जगह सहयोग आता है।
अहंकार की जगह आत्मीयता आती है।
अलगाव की जगह मैत्री आती है।
और अधिकार की जगह प्रेम आता है।
जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं और केवल त्याग भी नहीं; बल्कि प्रेम, विवेक, संतुलन और आत्मबोध के साथ जीवन को जीना है।
राधा-कृष्ण का संदेश
राधा-कृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि सृष्टि में विविधता के पीछे एकता का आधार है।
एक से अनेक होना सृष्टि है।
अनेक में एक को पहचानना साधना है।
प्रेम में उस एकत्व को अनुभव करना महारास है।
राधा प्रेम हैं।
कृष्ण चेतना हैं।
राधा समर्पण हैं।
कृष्ण आनंद हैं।
और दोनों का एकत्व उस पूर्णता का प्रतीक है, जिसकी तलाश मनुष्य बाहर भी करता है और अंततः अपने भीतर भी।
इसलिए रासलीला को केवल लौकिक दृष्टि से देखने के बजाय उसके प्रेम, भक्ति, चेतना और आत्मिक एकत्व के संदेश को समझना अधिक सार्थक है।
जब मनुष्य अपने भीतर के अहंकार को शांत कर प्रेम, मैत्री, करुणा और आत्मीयता को स्थान देता है, तब उसके भीतर भी एक वृंदावन बनता है।
वहीं राधा-भाव जागता है,
वहीं कृष्ण-चेतना का अनुभव होता है,
और वहीं से जीवन की अंतरंग महारास आरंभ होती है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की मंगलकामना
आइए, इस जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को केवल मंदिर में नहीं, अपने हृदय में खोजें और राधा को केवल एक नाम नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और तद्रूपता के भाव के रूप में समझें।
अपने भीतर के वृंदावन को प्रेम से सजाएँ, अहंकार को विराम दें और संबंधों में मैत्री तथा आत्मीयता का प्रकाश जगाएँ।
यही राधा-कृष्ण के प्रेम का सबसे सुंदर संदेश है।
💞 राधे-राधे। मधुरम्-मधुरम्।💞
🙏 जय श्रीराधे-कृष्ण।🙏
🌹श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर ‘देव चेतना’ और उलझन सुलझन' की ओर से सभी पाठकों को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएँ।🌹
मोहनलाल वर्मा (उलझन सुलझन के लिए सृजित)
देव चेतना, जयपुर
कान्हा के प्राकट्य दिवस* पर चंद दोहे श्रद्धा सुमन के रूप में
*रात घनेरी भाद्रपद,*
*मां देवकी निहाल।*
*वासुदेव हर्षित खड़े,*
*प्रकटे हैं गोपाल ।*
*ललना बन कान्हा फिरे , *हाथ यशोदा थाम।*
*लख नूतन छवि साँवरी ,*
*मुग्ध हुआ बृज धाम।*
*पीत वसन जब धार कर,*
*मोर मुकुट धर माथ।*
*ललना झूले पालना,*
*डोर नंद के हाथ।*
*लख शोभा हरि रूप की ,*
*मौन लेखनी मोर।*
*चित्त हमारा ले गया,*
*कान्हा माखन चोर।*
*माखन चोरी कर रहे,*
*ग्वाल बाल हैं साथ।*
*मटकी छीनी फोड़ दी,*
*गोपी पकड़े माथ ।*
*कान्हा-कान्हा कर रही,*
*मैया है बेहाल।*
*नटखट लीला कर रहे,*
*छुप कर के गोपाल।*
सीमा पाण्डेय 'सीमा'
रायपुर (छत्तीसगढ़)
१. राधे-कृष्ण का प्रेम और विरह
सुनो कान्हा
सुनो कान्हा,
जब प्रेम लाए हो दुनिया में,
तो विरह भी क्यों लाए हो?
यदि मिलन ही नियति होता,
तो ये भीगी-भीगी पलकों का संसार क्यों बनाते?
यदि साथ ही सब कुछ होता,
तो प्रतीक्षा को इतना सुंदर नाम क्यों देते?
तुमने प्रेम दिया,
तो उसके साथ तड़प भी दी,
मुस्कान दी,
तो आँखों की नमी भी दी।
राधा के अधरों पर हँसी रखी,
तो हृदय में तुम्हारी अनंत प्रतीक्षा भी।
मीरा को भक्ति दी,
तो जग का उपहास भी सहने दिया।
कान्हा,
अब समझ में आता है—
विरह कोई दंड नहीं, अपितु
प्रेम की सबसे गहरी साधना है।
क्योंकि जो हर पल तुम्हें याद करे,
जो दूरी में भी तुम्हें अपने भीतर पाए,
वही तो सच्चे प्रेम का अधिकारी कहलाए।
फिर भी एक प्रश्न आज भी शेष है—
सुनो कान्हा,
जब प्रेम लाए हो दुनिया में,
तो विरह भी क्यों लाए हो?
कान्हा का जवाब राधा को
विरह का वरदान
कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—
"प्रेम यदि केवल मिलन होता,
तो समय के साथ फीका पड़ जाता।
मैंने विरह इसलिए रचा,
कि स्मरण कभी समाप्त न हो।
मिलन में आँखें तृप्त होती हैं,
विरह में आत्मा जागती है।
जो दूर होकर भी मेरा हो जाए,
जो मौन में भी मेरा नाम सुन ले,
जो अश्रुओं में भी मेरा स्वर पहचान ले—
वही तो प्रेम का सच्चा साधक है।
राधा का प्रेम मिलन से नहीं,
विरह से अमर हुआ है।"
तब से समझ में आया—
प्रेम पुष्प है,
पर विरह उसकी सुगंध है।
प्रेम दीप है,
पर विरह उसकी अखंड लौ।
२. मेरे श्रीकृष्ण!
प्रेम में तुम्हारे
कुछ ऐसा रंगा मन,
कि अब कोई रंग
अलग से भाता नहीं।
तुम्हारी यादों की
हल्की-सी आहट भी
मन के सूने आँगन में
सावन बरसा जाती है।
तुम पास नहीं होते,
फिर भी जाने क्यों
हर पल तुम्हारा होना
महसूस होता है।
न कोई शिकायत है,
न कोई सवाल,
बस तुम्हारे नाम से
जुड़ा एक विश्वास है।
तुम्हें पाना ही प्रेम नहीं,
तुम्हें समझना भी प्रेम है,
तुम्हारी खामोशी को पढ़ना
और बिना कहे
तुम्हारे मन की बात समझ लेना भी प्रेम है।
प्रेम में तुम्हारे
मैंने खुद को खोया नहीं,
बल्कि खुद को
और बेहतर जाना है।
अब मेरी हर प्रार्थना में
तुम्हारा नाम नहीं,
बस तुम्हारी खुशियों की
एक छोटी-सी दुआ होती है।
शायद यही प्रेम है—
जहाँ अपना होना
धीरे-धीरे भूलकर
किसी की खुशी में
अपनी खुशी मिल जाती है।
३. मेरे कान्हा
मुरली की मधुर तान में,
बसते हैं श्याम हमारे,
मन की सूनी गलियों में,
जगमग करते नंददुलारे।
मोर मुकुट सिर पर सजे,
अधरों पर मुस्कान,
तेरी छवि निहारूँ कान्हा,
मिलता मन को ज्ञान।
राधा के संग प्रेम तुम्हारा,
जग को राह दिखाता,
निष्काम प्रेम की भाषा,
हर युग को समझाता।
जब-जब मन घबराता है,
तेरा नाम पुकारूँ,
हे गिरधर! अपनी शरण में,
बस इतना अधिकारूँ।
कर्म-पथ पर चलना सिखला,
फल की चिंता छोड़,
अधरों पर रख दे मुस्कान,
दुःख से नाता तोड़।
मेरे मन के मोहन तुम ही,
तुम ही मेरी आस,
तेरे चरणों में मिल जाए,
जीवन को विश्वास।
राधे-राधे कहता मन,
कृष्ण-कृष्ण हर साँस,
श्याम तुम्हारे नाम से ही,
जीवन में मधुमास। 🌺🙏
प्रमिला त्रिवेदी
रचनाकार
४. श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम...
“संगीत जब गीत बनकर लबों पर छा जाता है,
चुपके से कोई मीत बनकर साथ मेरे गुनगुनाता है।”
प्रकृति आपकी सबसे करीबी साथी है, जो आपके भीतर उतरकर आपको भीतर तक तर करती है। प्रकृति जब किसी के खोखलेपन को अपने स्वर देती है, तो वह बांसुरी कहलाती है और जहाँ बांसुरी का जिक्र हो, वहाँ कृष्ण स्वयं-ब-खुद चले आते हैं।
कहते हैं, जब कृष्ण बांसुरी बजाते थे तो बादल भी झूमकर मंद-मंद गरजने लगते थे, मानो उनकी तान के साथ ताल मिला रहे हों। प्रकृति जब किसी के साथ इस तरह जुड़ती है, तो वे पल अद्भुत हो जाते हैं। बांसुरी की तान हमें वही अलौकिक अनुभूति कराती है और हम सोचने लगते हैं—कहाँ गई वह बांसुरी, जो हर घड़ी राधा का नाम पुकारती थी? जिसकी तान सुनकर गोपियाँ दौड़ी चली आती थीं और जो हर दिल को अपने सुरों से हर लेती थी।
आज वही बांसुरी जैसे इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्रों की चकाचौंध में कहीं पीछे छूट गई है।
हमारे पुराने जमाने के संगीतकारों ने बांसुरी की धुन से गीतों को सजीव बनाया और प्रकृति की खूबसूरती को सुरों में उतारा। बिरहा हो या खुशी, दु:ख हो या मायूसी, दोस्ती हो या प्रेम—हर भाव को जब बांसुरी की धुन में पिरोया गया, तो गीत अमर हो गए।
आइए, नजर डालते हैं कुछ ऐसे ही सुमधुर गीतों पर, जिन्हें शायद आप भी आज तक नहीं भूले होंगे।
फिल्म ‘सूरत और सीरत’ का गीत—
“बहुत दिया देने वाले ने तुझको...”
इसमें बांसुरी के प्रयोग ने गीत को एक अलग ही मुकाम दिया।
फिल्म ‘सहेली’ का—
“जिस दिल में बसा था प्यार तेरा...”
दर्द में डूबी बांसुरी की धुन के साथ यह गीत सीधे दिल में उतरता चला गया।
फिल्म ‘तीसरी कसम’ का—
“दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई...”
और फिर ‘हीर रांझा’ का—
“मिलो न तुम तो हम घबराएँ...”
या फिल्म ‘प्रेम पर्वत’ का—
“यह दिल और उनकी निगाहों के साए...”
सुनते ही मन प्रकृति के खूबसूरत नजारों से जुड़ने लगता है।
‘सफर’ का—
“जो तुमको हो पसंद, वही बात कहेंगे...”
इस गीत में बांसुरी ने जो जादू बिखेरा है, वह अद्भुत है।
‘बसंत बहार’ का—
“मैं पिया तेरी, तू माने या न माने...”
और—
“किसी राह में, किसी मोड़ पर,
कहीं चल न देना तू छोड़कर...”
इस गीत को कर्णप्रिय बनाने में बांसुरी की मीठी तान का अपना ही जादू है।
फिल्म ‘अभिमान’ का—
“पिया बिन, पिया बिन, बाजे ना बाजे ना...”
वाला गीत भला कौन भूल सकता है?
बांसुरी की बात हो और राजेंद्र कुमार की फिल्म ‘गीत’ याद न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। फिल्म के लगभग हर गीत में बांसुरी को प्रमुखता दी गई और परिणाम सामने था—गीत एक से बढ़कर एक और बेहद लोकप्रिय।
इसी क्रम में फिल्म ‘हीरो’ के गीतों में भी बांसुरी की मधुर धुन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बांसुरी की तान के साथ जब ध्यान जुड़ जाता है, तो वह हमें इस दुनिया से दूर एक ऐसी एकात्मक, अलौकिक दुनिया में ले जाती है, जहाँ कुछ पल के लिए सिर्फ हम होते हैं और हमारे भीतर गूंजती उसकी तान।
लेकिन आज मन बार-बार पूछता है—
कहाँ गई वह माधुरी?
कहाँ गई वह बांसुरी?
क्या वह कृष्ण की गलियों में कहीं अब भी राधा का नाम पुकार रही है, या आधुनिक संगीत के शोर में उसकी वह मीठी तान कहीं खो गई है?
शायद बांसुरी आज भी वहीं है...
बस उसे सुनने वाला मन कहीं खो गया है।
५. परंपरा और करुणा का आधुनिक संगम...
भारतीय संस्कृति में त्यौहार केवल उत्सव मनाने का जरिया नहीं , बल्कि यह हमें प्रकृति और सभी जीवित प्राणियों के प्रति संवेदनशील होना सिखाते हैं। इस वर्ष जन्माष्टमी का पावन पर्व और वैश्विक स्तर पर मनाया जाने वाला वनस्पति दुग्ध दिवस हमारे सामने एक खूबसूरत और विचारणीय संयोग लेकर आए हैं।
भगवान श्री कृष्ण का पूरा जीवन गायों, प्रकृति और बेजुबान पशुओं के संरक्षण से जुड़ा रहा। कान्हा को माखन, मिश्री, दूध और राबड़ी का भोग लगाना हमारी अटूट श्रद्धा का प्रतीक है, लेकिन पशुओं के प्रति क्रूरता की चिंताएं भी सामने आ रही है। दूध न पच पाने की समस्या से भी लोग जूझ रहे हैं। ऐसे में वनस्पति दूध जैसे... बादाम, नारियल, सोया या काजू का दूध एक शुद्ध विकल्प बनकर उभरा है। नारियल के गाढे दूध से बनी साबूदाने की खीर या बादाम और काजू के दूध से तैयार की गई मलाईदार रबड़ी का स्वाद पारंपरिक मिठाइयों की तरह सुस्वाद और सुपाच्य होता है। बादाम या ओट्स का दूध सेहत के लिए हल्का और पौष्टिक साबित होता है।
स्वाद वही सोच नई
इस जन्माष्टमी पर प्लांट बेस्ड भोग तैयार करना केवल एक डाइट बदलना नहीं है, बल्कि यह श्रीकृष्ण के संदेश को अपने जीवन में उतारना भी है।
आइये इस बार माखन चोर के जन्मोत्सव पर अपनी थाली और भक्ति को पूरी तरह से अहिंसक और प्रकृति अनुकूल बनाएं। परंपराओं का सम्मान करते हुए वर्ल्ड प्लांट मिल्क डे के संदेश को अपनाकर कान्हा को करुणा से भोग लगायें। यही हमारे पर्यावरण, हमारे स्वास्थ्य और बेजुबान जीवों के प्रति भी सच्ची सेवा होगी।
रचनाकार
७±. प्यारे कृष्ण
कान्हा की ठुमकती ठुमकती प्यारी सी चाल
लगे माखन-मिश्री मखमली सी यह चाल
मासूम-सी खिली-खिली हँसी करती कमाल
बाँसुरी की मीठी तान करती भक्तों का उद्धार।
कमल से भी कोमल-कोमल उनके प्यारे हाथ,
मित्रों संग गोकुल के राजा खेलते दिन-रात,
कैसे मटकी फोड़ें होती बस यही खास बात,
ठिठोली रचते कन्हैया मिलता बलराम का साथ।
हैं यह सभी के मनमोहक प्यारे-प्यारे नाथ,
अपने असीम भक्तों का कभी न छोड़ते साथ,
उनके चरण-कमलों से गूँजता सारा वृंदावन धाम,
साँवरे घनश्याम बरसाते प्यार सभी के हैं राम।
उनके कमल नयनों में है बसा सारा यह संसार,
माखन प्रिय, घुँघराले बाल, प्यारी-सी मुस्कान,
अपने दर्शन देकर करते सबकी पूरी आस,
यशोदा नंदन गोपाला तुम से ही है जीवन संसार।
रचनाकार
जया सूद
(कवयित्री/कहानीकार)
पंजाब।
७. बेहतरीन सीख
आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाएं। इस अवसर पर आप सभी के साथ मैं एक स्वरचित गीत शेयर करने जा रही हूँ। इससे पहले मैं इसके विषय में कुछ बताना चाहूँगी।
सिम्फोबिया म्यूजिक अकादमी, पटना के मेंटर आदरणीय राजदीप चक्रवर्ती एवम् आदरणीय सौम्यदीप चक्रवर्ती के सौजन्य से, आग्रह से मैं सिम्फोबिया अकादमी से जुड़ी एवम् उनके छात्र, छात्राओं के लिए समय-समय पर विविध रूप के गानों के लिरिक्स लिखती आ रही हूँ। 2017- 2018 के बीच तीन भक्ति गीत के एलबम निकले हैं जिनमें लगभग तीस भजन के लिरिक्स मैंने लिखे हैं एवम् उन्हें सुरों से कम्पोज़ किया, कुछ गानों को गाया भी आदरणीय राजदीप चक्रवर्ती जी ने। साउंड इंजीनियरिंग एवम् मिक्सिंग का कार्य आदरणीय सौम्यदीप चक्रवर्ती ने किया है।
2024 के जन्माष्टमी के अवसर पर एक कृष्ण भजन लिखने का अवसर मुझको मिला। ईश्वर की साक्षात् कृपा बनी। उस भजन को मुख्य स्वर, भजन सम्राट पद्मश्री अनूप जलोटा जी ने दिया और उनका साथ अकादमी के छात्र श्री विवेकानंद कुमार एवम् छात्रा सुश्री आकांक्षा प्रिया ने दिया ।
2025 में पद्मश्री अनूप जलोटा जी ने इसी भजन को दोबारा मगर अकेले गाये क्योंकि उन्हें भजन के बोल, सुर, कंपोजिशन बहुत पसंद आये। मेरे लिए तो मानो स्वयं माँ सरस्वती की कृपा बरसी हो।
जन्माष्टमी के इस पावन अवसर पर भजन को पढ़कर आनंद लें एवम् विडियो लिंक से भजन सुनकर लाइक, कमेंट अवश्य करें।
मूरख मन
मूरख मन,
तू तो भटक ना हर द्वार
मूरख मन,
तू तो भटक ना हर द्वार
कान्हा जी बसे मन आगार
करे वो ही जग उद्धार
करे वो ही जग उद्धार
मूरख मन
तू तो भटक ना हर द्वार......
दु:ख - सुख का जग में है खेला
खेलते तुम्हीं गोपाला
दु:ख - सुख का जग में है खेला
खेलते तुम्हीं गोपाला
कष्ट हरण कर, सुख तुम देना
कष्ट हरण कर सुख तुम देना
ऐसा करो चमत्कार।
मूरख मन
तू तो भटक ना हर द्वार
कान्हा जी बसे मन आगार
करे वो ही जग उद्धार।
मूरख मन,
तू तो भटक ना हर द्वार....
इस जग- रथ के सारथी तुम हो
ब्रज के रास-रचैया
इस जग- रथ के सारथी तुम हो
ब्रज के रास रचैया
कहे महाभारत जीवन सार
हरे कृष्ण.... हरे कृष्ण... हरे कृष्ण..
कहे महा भारत जीवन सार
बेड़ा लगा दो पार।
मूरख मन,
तू तो भटक ना हर द्वार
कान्हा जी बसे मन आगार
करें वो ही जग उद्धार
करें वो ही जग उद्धार।
मूरख मन,
तू तो भटक ना, हर द्वार
मूरख मन,
तू तो भटक ना हर द्वार....
कर्म बिना फल माँगे मूरख
लोभ हरो नंद लाला
कर्म बिना फल माँगे मूरख
लोभ हरो नंदलाला
कृष्णा नाम ही है गीता सार
कृष्णा नाम ही है गीता सार
फिर क्यों सब बेजार।
मूरख मन,
तू तो भटक ना हर द्वार
कान्हा जी बसे मन आगार
करे वो ही जग उद्धार
करे वो ही जग उद्धार
मूरख मन,
तू तो भटक ना हर द्वार....
सृजक

















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