विवाह - ‘मैं’ को बचाते हुए ‘हम’ बनाना

विवाह 

‘मैं’ को बचाते हुए ‘हम’ बनाना

भूमिका

विवाह बदलते समय के साथ बदल रहा है। पहले जहाँ उसमें परिवार, सामाजिक परंपरा और सामंजस्य को अधिक महत्व दिया जाता था, वहीं आज व्यक्तिगत पहचान, आत्मनिर्भरता, समानता और आत्मसम्मान भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। यह बदलाव केवल महिलाओं के जीवन में नहीं आया; पुरुषों की भूमिका और उनसे जुड़ी अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं। ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं कि कौन बदले, बल्कि यह है कि दो स्वतंत्र व्यक्तित्व एक-दूसरे की स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करते हुए साथ कैसे चलें? प्रस्तुत आलेख इसी बदलती वैवाहिक सोच को सरल और संतुलित दृष्टि से समझने का प्रयास है।

आलेख

विवाह : ‘मैं’ को बचाते हुए ‘हम’ बनाना

विवाह को लंबे समय तक केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता रहा है। रिश्तों में प्रेम के साथ धैर्य, समझ, सहयोग और एक-दूसरे के लिए थोड़ा झुक जाने की भावना को भी महत्व दिया जाता था। समय बदला और विवाह को देखने का नजरिया भी बदलने लगा।

एक समय था, जब विवाह के बाद लड़की के लिए ससुराल एक नया संसार होता था—नया घर, नए लोग और नई जिम्मेदारियाँ। उससे परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की अपेक्षा अधिक रहती थी। आज परिस्थितियाँ पहले जैसी नहीं हैं। अब विवाह से पहले केवल लड़की ही नहीं, बल्कि लड़का और दोनों परिवार भी यह सोचने लगे हैं कि जीवनसाथी परिवार, जिम्मेदारियों और बदलती परिस्थितियों के साथ कितना सामंजस्य बना पाएगा।

माता-पिता की एक चिंता यह भी हो सकती है कि विवाह के बाद उनका बेटा उनसे भावनात्मक रूप से दूर न हो जाए। दूसरी ओर, आज की लड़की भी अपने जीवन, करियर, निर्णयों और सम्मान से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखना चाहती है। यह परिवर्तन समाज में बढ़ती शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति जागरूकता से भी जुड़ा है।

महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता ने निश्चित रूप से उनके आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाया है। यह एक सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपने निर्णय लेने की क्षमता नहीं, बल्कि अपने निर्णयों के परिणामों और रिश्तों के प्रति जिम्मेदारी को समझना भी है। इसी प्रकार, परिवार के प्रति जिम्मेदारी का अर्थ अपनी स्वतंत्रता या आत्मसम्मान को समाप्त कर देना भी नहीं है।

विवाह में समस्या अक्सर स्वतंत्रता या परंपरा से नहीं, बल्कि उनके बीच संतुलन की कमी से पैदा होती है। छोटी-सी असहमति जब संवाद के बजाय अहं का विषय बन जाती है, तो दूरी बढ़ने लगती है। कई बार बातचीत की जगह तकरार और समाधान की जगह अलगाव दिखाई देने लगता है।

तलाक को लेकर भी समाज में अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। किसी विवाह को हर परिस्थिति में बनाए रखना ही सफलता नहीं है; यदि रिश्ते में हिंसा, गंभीर उत्पीड़न, लगातार अपमान या असुरक्षित वातावरण हो, तो अलग होना आवश्यक और उचित विकल्प हो सकता है। लेकिन सामान्य मतभेदों और क्षणिक आवेश को बिना संवाद और समाधान के प्रयास के अंतिम निर्णय में बदल देना भी उचित नहीं माना जा सकता। प्रत्येक विवाह और प्रत्येक परिस्थिति अलग होती है।

इसी तरह, भरण-पोषण या आर्थिक सहायता के विषय को भी एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। जरूरतमंद व्यक्ति को कानून और परिस्थिति के अनुसार मिलने वाली आर्थिक सहायता सामाजिक और कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। इसे हर मामले में लालच का नाम देना उतना ही अनुचित है, जितना हर दावे को बिना परिस्थिति समझे सही या गलत मान लेना। वास्तविकता को समझने के लिए मामले की परिस्थितियों, जरूरतों और लागू कानून को देखना आवश्यक है।

विवाह में न केवल लड़की को बदलना चाहिए और न केवल लड़के को। दोनों को एक-दूसरे को समझने, सम्मान देने और आवश्यकता पड़ने पर अपने व्यवहार में सुधार करने की क्षमता विकसित करनी होगी।

आज का लड़का भी केवल ‘पति’ की पारंपरिक भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहता; वह एक संवेदनशील और सहयोगी जीवनसाथी बनने की अपेक्षा रख सकता है। उसी तरह आज की लड़की भी केवल ‘पत्नी’ या ‘बहू’ की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती। वह अपने व्यक्तित्व, प्रतिभा, करियर और सपनों के साथ विवाह में अपनी जगह चाहती है।

समस्या तब पैदा होती है, जब स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझ लिया जाता है और सामंजस्य को केवल समझौता। स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी आवश्यक है। सामंजस्य जरूरी है, लेकिन ऐसा सामंजस्य नहीं जिसमें किसी एक व्यक्ति का आत्मसम्मान लगातार दबता रहे।

पहले विवाह में अक्सर ‘मैं’ को ‘हम’ में बदलने की अपेक्षा की जाती थी। आज आवश्यकता यह है कि ‘मैं’ की पहचान को बनाए रखते हुए ‘हम’ बनाया जाए।

यही आधुनिक विवाह की चुनौती भी है और उसकी सुंदरता भी।

विवाह केवल समझौता नहीं, समझदारी है।
केवल साथ रहना नहीं, साथ समझना है।
केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है।
और सबसे बढ़कर—दो व्यक्तियों का ऐसा साथ है, जिसमें दोनों की गरिमा सुरक्षित रहे।

सृजक

हर्षा ठक्कर ‘हिना’

09/09/2026

प्रस्तुति











Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा

सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे जिएं - श्री संगीत शर्मा

रात भर एक करवट है माँ - विजया डालमिया (मदर्स डे पर विशेष)