कार्य और जिम्मेदारी
कार्य और जिम्मेदारी
कोई भी कार्य—और व्यापक अर्थ में कहें तो कर्म—जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। मनुष्य जब तक कर्म करता है, तब तक जीवन में गति बनी रहती है। बिना कर्म के न तो किसी उद्देश्य की ओर आगे बढ़ा जा सकता है और न ही किसी साध्य की प्राप्ति संभव है। सरल शब्दों में कहें तो कार्य किए बिना फल की अपेक्षा करना उचित नहीं है।
लेकिन कार्य करना और किसी कार्य की जिम्मेदारी लेना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
कार्य वह है जिसे हमें करना है या जिसे हम करना चाहते हैं, जबकि जिम्मेदारी उस कार्य के प्रति हमारी जवाबदेही, प्रतिबद्धता और कर्तव्य-बोध को व्यक्त करती है। जिम्मेदारी हमें किसी पद, भूमिका, संबंध, परिस्थिति या दायित्व के कारण प्राप्त हो सकती है; कई बार हम स्वयं भी अपनी इच्छा से कोई जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि हम कहीं नौकरी करते हैं तो केवल कार्यालय पहुँचना और निर्धारित कार्य कर देना ही पर्याप्त नहीं है। अपने कार्य को सही, समयबद्ध और उचित ढंग से करना हमारी जिम्मेदारी है। इसी प्रकार यदि हमने स्वेच्छा से किसी संस्था, परिवार, समाज या किसी व्यक्ति के प्रति कोई उत्तरदायित्व स्वीकार किया है, तो उसे ईमानदारी से निभाना हमारा कर्तव्य बन जाता है।
कई बार हमारे बड़े, परिचित, मित्र या परिजन हमें कोई जवाबदारी सौंपते हैं। उस जिम्मेदारी को स्वीकार करने के बाद उसके निर्वहन में कोताही करना केवल कार्य में कमी नहीं, बल्कि विश्वास के प्रति कमी भी हो सकती है। इसलिए जिम्मेदारी का संबंध केवल काम पूरा करने से नहीं, बल्कि उस विश्वास को बनाए रखने से भी है जो हमारे ऊपर किया गया है।
यदि कार्य को यात्रा मानें तो जिम्मेदारी उस यात्रा को सही दिशा और गंभीरता से पूरा करने का भाव है। कार्य हमें गति देता है और जिम्मेदारी उस गति को उद्देश्यपूर्ण बनाती है। कार्य हमारे हाथों से होता है, जबकि जिम्मेदारी हमारे विवेक और चरित्र से जुड़ती है।
यही कारण है कि कार्य और जिम्मेदारी में अंतर भले ही बहुत सूक्ष्म दिखाई दे, पर दोनों की अपनी अलग पहचान है। इनके बीच सचमुच एक हेयरलाइन डिफरेंस जैसा अंतर हो सकता है, लेकिन वही सूक्ष्म अंतर किसी व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व को बहुत अलग बना सकता है।
एक व्यक्ति कार्य तो कर सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह उस कार्य के प्रति जिम्मेदार भी हो। इसके विपरीत, जिम्मेदार व्यक्ति केवल कार्य पूरा करने की कोशिश नहीं करता, बल्कि यह भी देखता है कि कार्य उचित ढंग से, सही समय पर और अपेक्षित परिणाम के साथ पूरा हो।
इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि—
कार्य जीवन को गति देता है,
जिम्मेदारी उस गति को दिशा देती है।
कार्य से उपलब्धि मिल सकती है, लेकिन जिम्मेदारी से विश्वास अर्जित होता है। कार्य से परिणाम प्राप्त हो सकता है, लेकिन जिम्मेदारी से विश्वसनीयता बनती है।
जीवन की व्यवस्था भी इन दोनों के संतुलन पर ही टिकी है। परिवार में हमारी भूमिकाएँ हों, नौकरी में हमारे दायित्व हों, समाज के प्रति हमारा योगदान हो या स्वयं के भविष्य के प्रति हमारी प्रतिबद्धता—हर जगह कार्य और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं।
केवल जिम्मेदारी की बातें करते रहना पर्याप्त नहीं है और केवल कार्य करते चले जाना भी पर्याप्त नहीं। कार्य को जिम्मेदारी के भाव से करना ही उसके वास्तविक अर्थ को पूर्ण करता है।
इसीलिए जीवन रूपी नौका को सुचारु रूप से आगे बढ़ाने के लिए दोनों आवश्यक हैं। कार्य उसके चप्पू हैं और जिम्मेदारी उसकी दिशा। चप्पू हों लेकिन दिशा न हो तो यात्रा भटक सकती है; दिशा हो लेकिन चप्पू न चलें तो नौका आगे नहीं बढ़ सकती।
अतः जीवन की इस गणित में सफलता का सरल सूत्र शायद यही है—
कार्य करें,
जिम्मेदारी समझें,
और जो जिम्मेदारी स्वीकार करें, उसे पूरी निष्ठा से निभाएँ।
क्योंकि जीवन में केवल यह महत्वपूर्ण नहीं कि हमने क्या किया, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि हमने जो करने की जिम्मेदारी ली, उसे कितनी ईमानदारी और प्रतिबद्धता से निभाया।
सुषमा अग्रवाल
नागपुर, महाराष्ट्र
लेखिका की अन्य रचनायें


Comments
Post a Comment