सस्नेह मिले आमंत्रण से गरिमामयी प्रतिभाग तक

सस्नेह मिले आमंत्रण से गरिमामयी प्रतिभाग तक

सारिका जी की जुबानी

🌹 जय श्री कृष्ण 🙏🌹

कभी-कभी जीवन में कुछ निमंत्रण केवल किसी कार्यक्रम में उपस्थित होने का आग्रह नहीं होते, बल्कि वे स्नेह, सम्मान और आत्मीयता के ऐसे स्पर्श होते हैं, जिन्हें हृदय लंबे समय तक संजोकर रखता है।

मेरे लिए ऐसा ही एक अविस्मरणीय अनुभव आदरणीय रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे जी के स्नेहिल आमंत्रण से जुड़ा है।

वह आत्मीय आमंत्रण

ठीक दो दिन पहले एक कार्यक्रम के दौरान जब मैंने कक्ष में प्रवेश किया, तो अचानक मेरी नजर आदरणीय रामकृष्ण सर से मिली। उनकी चिरपरिचित आत्मीय मुस्कान ने जैसे पूरे वातावरण में अपनत्व भर दिया।

मैंने आगे बढ़कर सादर प्रणाम किया और उनके चरण स्पर्श किए। उसी क्षण उन्होंने अत्यंत सहजता, सरलता और आत्मीयता से मुस्कुराते हुए कहा—

"अपनी पुस्तक का 7 तारीख को विमोचन है, सारिका तुम्हें जरूर आना है... तुम यहाँ मिल गई हो, तो मैं तुम्हें यहीं आमंत्रित कर रहा हूँ।"

सर के ये शब्द मेरे लिए महज एक निमंत्रण नहीं थे। उनमें जो स्नेह, विश्वास और अपनापन था, उसने सीधे मेरे हृदय को छू लिया।

किसी बड़े साहित्यकार की महानता केवल उनकी रचनाओं में नहीं होती, बल्कि उनके व्यवहार की सरलता और लोगों के प्रति आत्मीयता में भी दिखाई देती है। उस दिन मुझे एक बार फिर अनुभव हुआ कि सच्ची महानता हमेशा सहजता और विनम्रता में ही निवास करती है।

उनके नेह-सिक्त शब्दों ने मेरे मन में इस कार्यक्रम के प्रति एक विशेष उत्सुकता और सम्मान भर दिया।

आमंत्रण से सहभागिता तक

और फिर वह दिन आया, जब साहित्य की इस अविरल यात्रा में एक और स्मरणीय शाम जुड़ गई।

आदरणीय रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे जी की अद्भुत कृति 'बोलती किताबें, खोलती मन' के दूसरे भव्य लोकार्पण समारोह में सम्मिलित होना मेरे लिए अत्यंत गौरव और सौभाग्य का विषय रहा।

70 वर्ष की आयु में 70 सम्मान और 22 कालजयी पुस्तकों के रचनाकार आदरणीय सर की अनवरत शब्द-साधना वास्तव में हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका साहित्यिक जीवन यह संदेश देता है कि उम्र कभी सृजनशीलता की सीमा नहीं होती; बल्कि अनुभवों की परिपक्वता शब्दों को और अधिक सार्थक बना सकती है।

मेरे लिए विशेष गौरव का क्षण

इस समारोह का महत्व मेरे लिए इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि मुझे इस अद्भुत पुस्तक के द्वितीय खंड का हिस्सा बनने का अवसर प्राप्त हुआ।

आदरणीय रामकृष्ण सर की विख्यात कृतियों—

* 'प्यार के धागे'

* 'सप्ताक्षरी'

* 'पंचाक्षरी'

पर अपनी समीक्षात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का सौभाग्य मुझे मिला। मेरी लिखी हुई समीक्षा को इस प्रतिष्ठित पुस्तक में ससम्मान स्थान दिया गया, यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है।

एक समीक्षक के रूप में सर की लेखनी की गहराई, संवेदनशीलता और वैचारिक विस्तार को शब्दों में पिरोना मेरे लिए स्वयं एक समृद्ध साहित्यिक अनुभव रहा।

'बोलती किताबें, खोलती मन' की विशेषता

इस कृति की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसका दो विशिष्ट खंडों में विभाजन है।

प्रथम खंड: इसमें उन चुनिंदा पुस्तकों को सम्मिलित किया गया है, जिन पर स्वयं आदरणीय रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे जी ने अपनी गहन पाठकीय समीक्षाएं और प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं।

द्वितीय खंड: इसमें विभिन्न प्रतिष्ठित लेखकों और समीक्षकों द्वारा आदरणीय सर की कालजयी कृतियों पर लिखी गई समीक्षाओं को स्थान दिया गया है।

इस प्रकार यह पुस्तक केवल एक लेखक की रचनात्मक यात्रा नहीं, बल्कि साहित्य और पाठकीय संवेदना के बीच स्थापित एक सुंदर संवाद भी है।

गरिमामयी मंच और सम्मानित अतिथि

समारोह की गरिमा को अनेक विशिष्ट साहित्यिक एवं सामाजिक व्यक्तित्वों की उपस्थिति ने और अधिक ऊंचाई प्रदान की।

मंच संचालन

कार्यक्रम की पूरी कमान और अत्यंत जीवंत, प्रभावशाली एवं शानदार संचालन की जिम्मेदारी आदरणीय विशेष अतिथि श्री अनिल मालोकर जी ने संभाली। उनके कुशल संचालन ने समारोह को निरंतर ऊर्जा और गरिमा प्रदान की।

विशेष अतिथि

श्री आदरणीय अविनाश बागड़े जी ने अपनी वैचारिक और आत्मीय उपस्थिति से कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए।

मुख्य अतिथि

समारोह के मुख्य अतिथि आदरणीय डॉ. मनोज पाण्डेय जी, हिंदी विभागाध्यक्ष, नागपुर विद्यापीठ रहे। उनकी विद्वतापूर्ण उपस्थिति ने आयोजन को विशेष शैक्षिक और साहित्यिक गरिमा प्रदान की।

अध्यक्षता

समारोह की अध्यक्षता आदरणीय श्री तेजिंदर सिंह रावल जी, सी.ए. एवं साहित्यकार, द्वारा की गई। उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को एक विशिष्ट वैचारिक ऊँचाई प्रदान की।

एक शाम, अनेक स्मृतियाँ

एक ही कृति का यह दूसरा सफल लोकार्पण समारोह केवल एक पुस्तक के विमोचन का आयोजन नहीं था, बल्कि यह साहित्यकार की निरंतर साधना, लोकप्रियता और व्यापक स्वीकार्यता का जीवंत प्रमाण भी है।

मेरे लिए यह अवसर इसलिए और अधिक विशेष रहा क्योंकि इस पूरे अनुभव की शुरुआत एक अत्यंत आत्मीय आमंत्रण से हुई थी और उसका समापन साहित्यिक सहभागिता, सम्मान और आत्मिक संतोष के रूप में हुआ।

मैं हृदय से आदरणीय रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे जी को इस अद्वितीय सफलता के लिए हार्दिक बधाई देती हूं और उनकी आने वाली नई पुस्तकों के लिए मंगलकामनाएं प्रेषित करती हूं।

आदरणीय मंच, सभी सम्मानित अतिथियों और साहित्यिक परिवार के प्रति हृदय से आभार।

सचमुच, कुछ निमंत्रण हमें केवल कार्यक्रमों तक नहीं ले जाते—वे हमें संबंधों की ऊष्मा, साहित्य की समृद्धि और जीवन की सुंदर स्मृतियों तक पहुंचाते हैं।🌹🙏

झलकियाँ








सूचना स्रोत

सारिका विजयवर्गीय 'वीणा'

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