हिन्दी दिवस पर

हिन्दी मेरी पहचान

माँ की मीठी लोरी है,

अपनों का एहसास है,

हिन्दी मेरे मन की भाषा,

हिन्दी मेरा विश्वास है।

शब्दों में इसकी खुशबू है,

भावों में मिठास है,

दिल से निकली हर अभिव्यक्ति में

इसका अपना वास है।

दूर देश में रहकर भी जो

अपनों से मिलवा दे,

मन के सूने आँगन में

अपनापन खिला दे।

ज्ञान मिले हर भाषा से,

 इसमें कोई बात नहीं,

 पर अपनी भाषा से बढ़कर

 मन के पास कोई बात नहीं।

आओ हिन्दी को सम्मान दें,

इसका मान बढ़ाएँ,

अपने शब्दों की इस दुनिया को

नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ।

हिन्दी केवल शब्द नहीं,

यह मन की आवाज़ है,

मेरे देश की मिट्टी की

सबसे प्यारी साज है।

हिन्दी मेरी शान है,

हिन्दी मेरी पहचान है।

हिन्दी दिवस पर रचना

आसान होते हैं संवाद मेरे,

जब मैं हिन्दी में बात करती हूंँ,

और लगे बड़ी प्यारी मुझे ये,

हर शब्द जब मैं लिखती हूंँ,

गर्व है वर्णमाला पर इसकी,

कठिन है पर आसान करने की

कोशिश करती हूंँ,

होती हूंँ आनंद विभोर मैं,

जब हर शब्द मैं इसका पढ़ती हूंँ,

लगे आसान धर्म ग्रंथ भी,

जब मैं हिन्दी में पढ़ती हूंँ,

कोई  ना संशय रहता मन में,

हर शब्द का अर्थ मैं समझती हूंँ,

हर भाषा का एक स्वरूप होता है,

मैं हिन्दी को अपना रूप समझती हूंँ,

जब इससे होते संवाद मेरे, तब,

ये बहुत अपनी अपनी-सी लगती है।

रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी।

प्रस्तुति


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