रामी : एक शाम, जो पर्यावरण के नाम रही

रामी : एक शाम, जो पर्यावरण के नाम रही

कहानी 'रामी' का मंचन : एक प्रत्यक्षदर्शी की आँखों देखी



रुकें कुल्हाड़ी, बढ़े हरियाली; 

तभी जीवन में आए खुशहाली!


कुछ शामें केवल कार्यक्रम बनकर नहीं आतीं, वे अपने पीछे एक विचार, एक संवेदना और एक प्रश्न छोड़ जाती हैं। आगरा के माथुर वैश्य सभा भवन में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) द्वारा प्रस्तुत नाटक 'रामी' की शाम भी ऐसी ही एक यादगार शाम रही।

मैं इस प्रस्तुति का प्रत्यक्षदर्शी था। मंच पर घटित घटनाओं को देखते हुए धीरे-धीरे यह महसूस हुआ कि हम केवल एक नाटक नहीं देख रहे हैं, बल्कि प्रकृति, मनुष्य और विकास के बीच बदलते संबंधों का एक मार्मिक दस्तावेज देख रहे हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. ज्योत्सना रघुवंशी के संबोधन से हुई। उन्होंने भारतीय जन नाट्य संघ, अर्थात् इप्टा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्ष 1942 में बंगाल अकाल के समय राजेंद्र रघुवंशी ने बिशन खन्ना के साथ मिलकर एक सांस्कृतिक दल की स्थापना की थी।

गीतों और नाटकों के माध्यम से जनता में जागरूकता फैलाने का यह प्रयास आगे चलकर वर्ष 1943 में भारतीय जन नाट्य संघ की विधिवत स्थापना का आधार बना। समय के साथ इप्टा का कारवाँ आगे बढ़ता रहा। कुछ व्यवधानों के बाद वर्ष 1985 में राजेंद्र रघुवंशी द्वारा राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित कर इस सांस्कृतिक आंदोलन में पुनः नवप्राण का संचार किया गया।

प्रो. ज्योत्सना रघुवंशी की बात विशेष रूप से उल्लेखनीय लगी कि रंगमंच ऐसा माध्यम है, जो जनता से सीधे संवाद करता है। सचमुच, उस शाम यह बात मंच पर साकार होती दिखाई दी।

अतिथियों का सम्मान

कार्यक्रम में जोधपुर से पधारे प्रसिद्ध कहानीकार श्री सत्यनारायण जी का विशेष स्वागत किया गया। उनकी कहानी 'रामी' पर आधारित यह नाट्य प्रस्तुति उनके लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर थी।

संयोजक नीरज मिश्रा ने माल्यार्पण कर उनका स्वागत किया तथा आगरा इप्टा के अध्यक्ष सुबोध गोयल ने शॉल ओढ़ाकर उनका सम्मान किया।

छत्तीसगढ़ से पधारे साहित्यकार जय प्रकाश का भी शकील चौहान द्वारा माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। साहित्य और रंगमंच के इस आत्मीय मिलन ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया।

जब मंच पर आई रामी

नाटक आरंभ होते ही दर्शकों का ध्यान मंच पर केंद्रित हो गया।

'रामी' एक बंजारन बच्ची की कहानी है, जो प्रकृति से गहरा प्रेम करती है। विशाल बरगद का वृक्ष हो, कैर की झाड़ी हो, कोई कुआँ हो या प्रकृति का कोई साधारण-सा दृश्य—रामी हर चीज को आश्चर्य और अपनत्व से निहारती है।

मंच पर रामी का चरित्र केवल एक बच्ची के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति मनुष्य की सहज संवेदना के प्रतीक के रूप में उभरकर सामने आया।

निवेदिता ने रामी की भूमिका में ऐसी सहजता और भावनात्मक गहराई प्रस्तुत की कि दर्शक उसके साथ जुड़ते चले गए। उसकी आँखों में प्रकृति के प्रति प्रेम और संवादों में जीवन के प्रति सरल दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता था।

रामी और सत्या की मित्रता

कहानी में सत्या नामक बालक का परिवार स्थानांतरण के कारण उस क्षेत्र में आता है। यहीं रामी और सत्या की मित्रता होती है।

दोनों बच्चों की मित्रता कहानी का अत्यंत सुंदर पक्ष है। रामी सत्या को प्रकृति के वे अद्भुत दृश्य दिखाती है, जिन्हें सामान्यतः हम देखते हुए भी महसूस नहीं करते।

रामी की दृष्टि से सत्या प्रकृति को जानता और समझता है। दोनों के बीच विकसित होता यह संबंध बालमन की सरलता के साथ-साथ पर्यावरणीय चेतना का भी आधार बनता है।

सत्या की भूमिका में रविंदर ने प्रभावशाली अभिनय किया। रामी और सत्या के बीच के दृश्य दर्शकों को बचपन की सहज दुनिया में ले जाते हैं, जहाँ प्रकृति और मित्रता दोनों जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं।

बीस वर्षों का अंतराल

समय अपनी गति से आगे बढ़ता है। सत्या के पिता का पुनः स्थानांतरण हो जाता है और दोनों बच्चे अलग हो जाते हैं।

यह बिछोह कहानी को एक नए मोड़ पर ले जाता है। बीस वर्ष बाद सत्या फिर उसी क्षेत्र में लौटता है और रामी को खोजने का प्रयास करता है।

लेकिन इस बार उसके सामने बचपन की वही दुनिया नहीं होती। समय के साथ क्षेत्र बदल चुका होता है। प्राकृतिक सौंदर्य धीरे-धीरे औद्योगीकरण और शहरीकरण की भेंट चढ़ चुका होता है।

जहाँ कभी पेड़-पौधे, खुले मैदान और प्राकृतिक जीवन था, वहाँ अब विकास की नई संरचनाएँ दिखाई देती हैं।

विकास की कीमत

नाटक का सबसे मार्मिक पक्ष तब सामने आता है, जब सत्या को पता चलता है कि प्रकृति को बचाने के प्रयास में रामी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।

यह दृश्य केवल एक पात्र की मृत्यु का दृश्य नहीं था। यह उस संघर्ष का प्रतीक था, जिसमें एक ओर प्रकृति को बचाने की संवेदना है और दूसरी ओर अंधाधुंध विकास की दौड़।

रामी का चरित्र दर्शकों के सामने एक प्रश्न बनकर खड़ा हो जाता है—

क्या विकास इतना आवश्यक है कि उसके लिए प्रकृति का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जाए?

क्या आने वाली पीढ़ियों के लिए हम केवल इमारतें छोड़ेंगे या जीवन देने वाली हरियाली भी?

इन प्रश्नों ने सभागार में बैठे दर्शकों को भीतर तक प्रभावित किया।

अभिनय और मंचीय प्रस्तुति

नाटक के सभी कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिकाओं को प्रभावशाली ढंग से निभाया।

रामी की भूमिका में निवेदिता और सत्या की भूमिका में रविंदर विशेष रूप से सराहनीय रहे। सूत्रधार की भूमिका में असलम खान ने कथा को सहज रूप से आगे बढ़ाया।

जय कुमार ने लेखक की भूमिका निभाई, पार्थो घोष ने ग्रामीण पात्र को जीवंत बनाया तथा पूजा पाराशर ने सत्या की माँ की भूमिका में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई।

कुमकुम रघुवंशी का पार्श्व स्वर प्रस्तुति के भावनात्मक वातावरण को मजबूत करता रहा।

मंच के पीछे की सामूहिक साधना

किसी भी सफल नाट्य प्रस्तुति के पीछे अनेक लोगों का परिश्रम छिपा होता है।

संगीत संयोजन सिद्धार्थ रघुवंशी का रहा, जबकि संगीत संचालन परमानंद शर्मा ने संभाला। नृत्य संयोजन पूजा शर्मा ने किया और प्रकाश व्यवस्था बब्बू की रही।

शकील चौहान और शैलेन्द्र शर्मा ने प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली। कुमकुम रघुवंशी और मुक्ति किंकर का विशेष सहयोग रहा। रिकॉर्डिंग का दायित्व इमामुद्दीन ने निभाया और रूपसज्जा आनंद बंसल की रही।

इन सभी सहयोगियों के सामूहिक प्रयास ने मंच पर कहानी को प्रभावशाली रूप प्रदान किया।

निर्देशक का सार्थक प्रयास

नाटक का नाट्य रूपांतरण और निर्देशन दिलीप रघुवंशी ने किया।

किसी कहानी को मंच पर प्रस्तुत करना केवल संवादों को बोल देना नहीं होता। उसके भाव, वातावरण, पात्रों और संदेश को दर्शकों तक पहुँचाना एक कठिन रचनात्मक कार्य है।

दिलीप रघुवंशी के निर्देशन में 'रामी' का पर्यावरणीय संदेश अत्यंत सहज और प्रभावशाली ढंग से सामने आया।

नाटक कहीं भी उपदेशात्मक नहीं लगा। कहानी के पात्रों और घटनाओं के माध्यम से संदेश स्वतः दर्शकों तक पहुँचता रहा।

यही रंगमंच की शक्ति है—वह हमें सोचने के लिए मजबूर करता है, बिना किसी अतिरिक्त आग्रह के।

एक गहरी पर्यावरणीय पुकार

नाटक समाप्त होने के बाद भी उसके दृश्य और संवाद मन में बने रहे।

'रुकें कुल्हाड़ी, बढ़े हरियाली; तभी जीवन में आए खुशहाली' केवल एक नारे की तरह नहीं, बल्कि पूरी प्रस्तुति का सार बनकर उभरा।

आज जब शहरों का विस्तार हो रहा है, पेड़ों की कटाई बढ़ रही है और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, ऐसे समय में 'रामी' जैसे नाटक समाज के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

यह प्रस्तुति हमें याद दिलाती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

सम्मान और समापन

नाटक के समापन पर क्रांतिकारी रोशन लाल सुतेल स्मृति समिति द्वारा सभी प्रतिभागी कलाकारों को पुरस्कार प्रदान किए गए।

आगरा इप्टा के अध्यक्ष सुबोध गोयल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम में डॉ. शशि तिवारी, अनिल शुक्ला, प्रियंका मिश्रा, अनिल जैन, धर्मजीत सिंह सहित शहर के अनेक गणमान्य साहित्यप्रेमियों और रंगकर्मियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

प्रत्यक्षदर्शी के रूप में अंतिम अनुभूति

सभागार से बाहर निकलते समय ऐसा लगा कि 'रामी' समाप्त नहीं हुई है। वह हमारे साथ बाहर चली आई है।

वह हर उस पेड़ में दिखाई देती है, जिसे काटने से पहले हम एक बार भी नहीं सोचते। वह हर उस बच्चे की आँखों में दिखाई देती है, जिसे खुला आकाश और हरियाली चाहिए। वह हर उस व्यक्ति के अंतर्मन में प्रश्न बनकर उपस्थित है, जो विकास और प्रकृति के बीच संतुलन की आवश्यकता को समझता है।

आगरा इप्टा और निर्देशक दिलीप रघुवंशी ने एक सार्थक प्रयास किया है। उन्होंने मनोरंजन के माध्यम से चेतना जगाने का कार्य किया है।

एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में मेरी यही अनुभूति है कि उस शाम माथुर वैश्य सभा भवन में केवल 'रामी' का मंचन नहीं हुआ, बल्कि प्रकृति की ओर लौटने का एक सामूहिक आह्वान हुआ।

रामी की कहानी हमें यही सिखाती है—

पेड़ बचेंगे तो जीवन बचेगा,

हरियाली बचेगी तो खुशहाली बचेगी,

और प्रकृति बचेगी तो मानवता का भविष्य बचेगा।

सृजक

श्री सत्यनारायण जी (कहानीकार) 

संग्राहक

विवरण पत्रक

झलकियाँ


















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