चीखें - गीता ठाकुर

 चीखें

जो चीखें रात भर चिल्लाती रहीं,

क्या सचमुच किसी ने उन्हें सुना?

दीवारें खड़ी रहीं, दरवाजे बंद रहे और समाज अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहा। लेकिन किसी के दर्द की आवाज कभी केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। वह हमारे सामूहिक विवेक को पुकारती है।

आखिर इंसान इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है?

स्त्री के प्रति हिंसा केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध अपराध नहीं, बल्कि मनुष्यता के मूल्यों पर प्रश्नचिह्न है। जिस समाज में नारी को सम्मान, शक्ति और सृजन का प्रतीक माना जाता है, उसी समाज में उसके साथ अमानवीय व्यवहार क्यों होता है? यह प्रश्न केवल कानून से नहीं, प्रत्येक परिवार, विद्यालय और व्यक्ति से भी पूछा जाना चाहिए।

हर मनुष्य अपने जीवन की शुरुआत किसी मां की गोद से करता है। जन्म देने वाली मां की पीड़ा, पालन-पोषण का स्नेह और परिवार के संस्कार उसके जीवन की पहली पाठशाला होते हैं। फिर वही मनुष्य किसी अन्य स्त्री के सम्मान और स्वतंत्रता को समझने में असफल क्यों हो जाता है?

स्त्री कोई वस्तु नहीं है। वह अपनी इच्छा, गरिमा, अधिकार और स्वाभिमान से पूर्ण एक स्वतंत्र मनुष्य है। उसके शरीर, जीवन और निर्णयों पर किसी अन्य व्यक्ति का अधिकार नहीं हो सकता।

नारी के प्रति अपराधों को केवल सनसनीखेज घटनाओं के नाम से याद करना पर्याप्त नहीं है। हमें उन घटनाओं के पीछे छिपी मानसिकता को समझना होगा और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पीड़ित व्यक्ति की पहचान, गरिमा और न्याय की आवश्यकता को समाज कभी न भूले।

प्रश्न यह भी है कि हम बेटियों को केवल सावधान रहना क्यों सिखाते हैं? बेटों को सम्मान करना, सहमति को समझना, सीमाओं का आदर करना और जिम्मेदार नागरिक बनना क्यों नहीं सिखाते?

सशक्तिकरण का अर्थ केवल बाहरी सुरक्षा साधनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा, आत्मविश्वास, कानूनी जानकारी, आर्थिक स्वतंत्रता, तकनीकी जागरूकता और आवश्यकता पड़ने पर आत्मरक्षा का प्रशिक्षण—ये सभी एक सक्षम जीवन के आवश्यक अंग हैं।

लेकिन यह जिम्मेदारी केवल स्त्री की नहीं है।

समाज की जिम्मेदारी है कि वह अपराध को छिपाए नहीं, पीड़ित को दोषी न ठहराए और अन्याय के सामने मौन न रहे। परिवार की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों में संवेदनशीलता और समानता के संस्कार विकसित करे। संस्थाओं और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए और कानून निष्पक्ष एवं प्रभावी ढंग से लागू हो।

महाभारत हमें केवल युद्ध की कथा नहीं सुनाता, बल्कि मौन की कीमत भी समझाता है। जब अन्याय सामने हो और लोग अपनी आंखें बंद कर लें, तब समस्या केवल अपराधी की नहीं रहती; समाज की निष्क्रियता भी प्रश्नों के घेरे में आती है।

आज आवश्यकता किसी प्रतिशोध की नहीं, बल्कि जागरूकता और जिम्मेदारी की है। हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां किसी लड़की को अपनी सुरक्षा के लिए अकेले संघर्ष न करना पड़े और किसी भी अपराधी को सामाजिक मौन का लाभ न मिले।

हर चीख हमें जगाने आई है।

हर आंसू हमें संवेदनशील बनने का अवसर देता है।

और हर बेटी का सम्मान केवल उसका अधिकार नहीं, बल्कि सभ्य समाज की पहचान है।

आइए, ऐसी संस्कृति का निर्माण करें जहां स्त्री को भय से नहीं, सम्मान से देखा जाए; जहां कानून पर विश्वास हो, समाज सजग हो और मनुष्य अपनी मनुष्यता को कभी न भूले।

रचनाकार

गीता ठाकुर

स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन

दिल्ली महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति









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