सच्चा प्रेम मैंने पार्वती से सीखा
सच्चा प्रेम मैंने पार्वती से सीखा
छः बरस की उम्र में शायद
मुझे प्रेम का अर्थ नहीं आता था,
बस शिव के पास बैठा मेरा मन
पार्वती को निहारा करता था।
तब समझ नहीं थी रिश्तों की,
न समर्पण की कोई भाषा,
फिर भी जाने क्यों मन में
उनकी छवि लगती थी सबसे प्यारी आशा।
धीरे-धीरे उम्र बढ़ी तो
मन ने कुछ बातें जानीं—
प्रेम केवल साथ चलना नहीं,
प्रेम है भीतर से किसी को मानना भी।
सच्चा प्रेम क्या होता है,
यह मैंने पार्वती से सीखा है,
जिसे मन से अपना मान लिया,
उसके प्रति विश्वास रखना सीखा है।
प्रेम में केवल फूल नहीं होते,
कुछ काँटे भी स्वीकारने पड़ते हैं,
कुछ राहें चुपचाप चलनी पड़ती हैं,
कुछ उत्तर बिना पाए भी बढ़ते हैं।
पार्वती से मैंने जाना—
समर्पण का अर्थ मिट जाना नहीं,
प्रेम में अपने अस्तित्व को खोना नहीं,
बल्कि अपने सत्य के साथ खड़े रहना है।
प्रेम वह नहीं जो दुनिया देखे,
प्रेम वह है जो मन पहचान ले,
बिना शब्दों के भी जिसकी सच्चाई
अंतरात्मा जान ले।
मैंने पार्वती से सीखा—
प्रेम में अधिकार नहीं, विश्वास हो,
पास रहने की ज़िद नहीं,
मन में रहने का एहसास हो।
और तभी अपने भोले को देखकर
मन में एक बात उतरती गई—
भक्ति और प्रेम की राहें शायद
एक ही जगह आकर मिलती गईं।
मैंने शिव को माँगा नहीं कभी
दुनिया की किसी वस्तु की तरह,
बस मन ने उन्हें अपना आराध्य माना,
एक पवित्र विश्वास की तरह।
मैं भक्त हूँ—
यही मेरा सबसे सुंदर परिचय है,
मेरे लिए शिव को चाहना
किसी पाने की इच्छा नहीं,
बस श्रद्धा का एक निर्मल प्रणय है।
पार्वती ने मुझे यह सिखाया—
जिसे प्रेम करो, उसका सम्मान करो,
उसके सुख में मन से प्रसन्न हो,
और उसके सामने अपना मन सच्चा रखो।
प्रेम में शोर नहीं चाहिए,
न हर पल कोई प्रमाण चाहिए,
जहाँ विश्वास जीवित हो जाए,
वहाँ मौन भी पहचान बन जाता है।
छः साल की वह छोटी बच्ची
आज भी मेरे भीतर रहती है,
पूजा भले बदल गई हो मेरी,
पर उसकी श्रद्धा आज भी वही कहती है—
“भोले, मुझे कुछ और नहीं चाहिए,
बस भक्त बनाकर रखना,
मेरे मन में प्रेम की पवित्रता
और अपनी भक्ति बनाए रखना।”
अब समझ पाई हूँ—
सच्चा प्रेम किसी को पा लेना नहीं,
किसी के प्रति मन को
सच्चा और निर्मल रख पाना है।
और यह बात
मैंने किसी किताब से नहीं सीखी,
किसी दुनिया की सीख से नहीं—
सच्चा प्रेम क्या होता है,
मैंने पार्वती से सीखा है।
उनकी भक्ति से धैर्य लिया,
उनकी निष्ठा से विश्वास,
और शिव के चरणों में रख दिया
अपने मन का हर अहसास।
आज भी जब आँखें बंद करती हूँ,
वही बचपन लौट आता है—
एक छोटी-सी भक्त,
सामने शिव-पार्वती,
और मन में बस एक भाव—
प्रेम पवित्र रहे,
भक्ति सच्ची रहे,
और मेरे आराध्य से
मेरा यह नाता जन्म-जन्म तक बना रहे।
सृजक
सरोज प्रसाद राय


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