किशोरों की दशा व दिशा
किशोरों की दशा व दिशा
चंचलिका जी का संबोधन
मेरे प्रिय साथियो!
आप सभी को मेरा सादर नमस्कार।
आज मैं जिस विषय पर अपने विचार आपके समक्ष रखने जा रही हूँ, वह केवल किशोरों या युवाओं का विषय नहीं है, बल्कि पूरे समाज और देश के भविष्य से जुड़ा हुआ विषय है—"किशोरों की दशा व दिशा"।
किशोरावस्था जीवन की वह अवस्था है, जब मन में अनगिनत सपने जन्म लेते हैं। शरीर और मन में परिवर्तन होते हैं, सोच का विस्तार होता है और आसमान को छू लेने की इच्छा जागती है। इस उम्र में व्यक्ति अपने लिए एक पहचान बनाना चाहता है। लेकिन यदि समाज और व्यवस्था की दिशा स्पष्ट न हो, तो यही ऊर्जा असमंजस, आक्रोश और संघर्ष का कारण भी बन सकती है।
आज विश्व की एक बड़ी युवा आबादी ऐसी पीढ़ी का हिस्सा है, जिसका जन्म लगभग 1997 से 2012 के बीच हुआ है। यह पीढ़ी तकनीक, इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों के साथ बड़ी हुई है। इसे हम जेनरेशन-जेड या डिजिटल पीढ़ी भी कहते हैं। यह पीढ़ी प्रश्न पूछती है, अपने अधिकारों को समझती है और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस रखती है।
लेकिन आज हमारे सामने एक बड़ा प्रश्न है—क्या हम अपने किशोरों और युवाओं को वह वातावरण दे पा रहे हैं, जिसकी उन्हें आवश्यकता है?
यदि युवाओं के प्रति समाज में अव्यवस्था हो, शिक्षा और रोजगार के अवसर सीमित हों तथा शासन-प्रशासन उनकी समस्याओं को गंभीरता से न ले, तो उनका असंतोष स्वाभाविक है। यही असंतोष धीरे-धीरे आंदोलनों का रूप लेता है।
हमने पिछले कुछ समय में युवाओं के अनेक आंदोलनों को देखा है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएं, प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं, शिक्षा व्यवस्था की खामियां और बढ़ती महंगाई जैसे विषयों ने युवाओं को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर किया है।
राजस्थान के ज़ेन जी जैसे युवाओं का आंदोलन हो, या विभिन्न राज्यों में रोजगार और शिक्षा के अधिकार के लिए उठती आवाजें—ये सभी इस बात का संकेत हैं कि आज की युवा पीढ़ी केवल दर्शक बनकर रहना नहीं चाहती। वह अपने भविष्य के निर्माण में सक्रिय भागीदारी चाहती है।
किसानों की समस्याएं भी हमारे युवाओं के सामने एक बड़ा प्रश्न बनकर खड़ी हैं। किसान अपने परिश्रम का उचित मूल्य चाहता है। वह चाहता है कि उसकी उपज का सम्मानजनक मूल्य मिले और उसकी मेहनत व्यर्थ न जाए। यह केवल किसानों का विषय नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है।
इसी प्रकार पर्यावरण की समस्या भी आज के युवाओं के सामने गंभीर चुनौती है। नदियों और बांधों के निर्माण से विस्थापित होने वाले लोगों की समस्याएं, प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित उपयोग हमारे भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं। युवा पीढ़ी इन विषयों पर भी जागरूक हो रही है और जन-जागरूकता के माध्यम से परिवर्तन का प्रयास कर रही है।
मेरा मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार से प्रश्न पूछना नागरिकों का अधिकार है। सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। आम नागरिकों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सवाल कर सकें और अपनी बात पारदर्शिता के साथ रख सकें।
यह भी आवश्यक है कि सरकार और जनता के बीच विश्वास बना रहे। जब जनता अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाती है, तो उसे केवल विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसकी आवाज के पीछे छिपी वास्तविक समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
आज देश के युवाओं में असंतोष के कई कारण हैं। सरकारी व्यवस्थाओं में कमियां, भाई-भतीजावाद, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने युवाओं के सामने अनेक कठिनाइयां खड़ी कर दी हैं।
कई बार ऐसा भी होता है कि युवाओं को उचित अवसर नहीं मिलते, जबकि उनकी प्रतिभा और क्षमता किसी भी क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर सकती है। हमें यह समझना होगा कि युवा केवल रोजगार पाने वाले व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं।
मैं यहां एक और महत्वपूर्ण बात कहना चाहूंगी कि किशोरों और युवाओं की समस्याओं को केवल उनकी उम्र का प्रभाव समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनकी बेचैनी के पीछे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक कारण भी होते हैं। यदि हम उन्हें सही दिशा नहीं देंगे, तो उनकी ऊर्जा गलत रास्तों की ओर जा सकती है।
आज आवश्यकता है कि परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार मिलकर युवाओं के लिए ऐसा वातावरण तैयार करें, जहां वे प्रश्न पूछ सकें, अपनी प्रतिभा विकसित कर सकें और सम्मानपूर्वक अपने भविष्य का निर्माण कर सकें।
हमारे समाज में बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा, दोनों मिलकर देश को नई दिशा दे सकते हैं। दुर्भाग्य से कई बार पीढ़ियों के बीच संवाद का अभाव दिखाई देता है। युवाओं को लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, जबकि बुजुर्गों को लगता है कि युवा अनुभवहीन हैं।
हमें इस दूरी को समाप्त करना होगा।
अनुभव और ऊर्जा का समन्वय ही किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति बन सकता है। यदि बुजुर्ग मार्गदर्शन दें और युवा उसे अपनी रचनात्मक शक्ति के साथ आगे बढ़ाएं, तो देश में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
मैं विशेष रूप से अपने किशोर साथियों से कहना चाहूंगी कि समस्याओं से घबराने की आवश्यकता नहीं है। अपनी आवाज उठाना आपका अधिकार है, लेकिन अपनी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देना भी उतना ही आवश्यक है।
आंदोलन केवल विरोध का माध्यम नहीं होना चाहिए, बल्कि समाधान की खोज का माध्यम भी बनना चाहिए। हमें प्रश्न पूछने के साथ-साथ उत्तर खोजने की आदत विकसित करनी होगी।
हमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए, लेकिन अपने कर्तव्यों को भी नहीं भूलना चाहिए। हमें शिक्षा, अनुशासन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा।
यदि आज के किशोर सही दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो आने वाला भारत अधिक जागरूक, अधिक संवेदनशील और अधिक मजबूत बन सकता है।
अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि देश का भविष्य केवल सरकारों या राजनीतिक दलों के हाथ में नहीं है। देश का भविष्य हमारे किशोरों, युवाओं, शिक्षकों, अभिभावकों और जागरूक नागरिकों के हाथ में भी है।
आइए, हम ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें जहां हर किशोर को सही शिक्षा मिले, हर युवा को अवसर मिले, हर नागरिक की आवाज सुनी जाए और विकास की दिशा में सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो।
क्योंकि—
युवा केवल भविष्य नहीं हैं, युवा वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति हैं।
उन्हें रोकने की नहीं, समझने की आवश्यकता है।
उन्हें दबाने की नहीं, दिशा देने की आवश्यकता है।
और उन्हें अकेला छोड़ने की नहीं, उनके साथ चलने की आवश्यकता है।
इसी विश्वास के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।
धन्यवाद।
सूचना स्रोत
चंचलिका शर्मा
कोलकाता
प्रस्तुति








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