हिन्दी दिवस पर विशेष
नमस्कार!
मैं हूँ हिन्दी…
आपकी अपनी हिन्दी।
अपनी…
याद है ना?
पिछली बार भी तो
14 सितंबर को
आपने मुझे बड़े प्यार से याद किया था।
कई भाषण हुए,
कई प्रतियोगिताएँ हुईं,
कविताएँ पढ़ी गईं,
नारे लगाए गए…
और फिर…
OMG! Time कितनी fast चला जाता है!
I have no words!
एक साल फिर बीत गया
और मैं सोचती रही—
TBH…
मेरी अहमियत slowly कम होती चली जा रही है।
RN…
I am feeling alone!
कभी मैं आपके
घर की शान हुआ करती थी,
आपकी बातों की जान हुआ करती थी।
पहले तो मैं GOAT हुआ करती थी…
पर आज—
IDK क्यों,
जो मेरा उपयोग करता है,
उसे inferior समझा जाता है।
English is my friend!
मुझे कोई objection नहीं।
तुम उसका use frequently करो,
नई भाषाएँ सीखो,
दुनिया से जुड़ो,
आगे बढो
बस…
जब feelings की बात आए,
तो उन्हें भावनाएँ कहना।
जब parents को miss करो,
तो कहना—
“माँ-पिताजी की याद आ रही है।”
जब थोड़ा devotional हो जाओ,
तो सिर्फ “prayer” मत करना…
कभी आरती, स्तुति और भजन भी करना।
जब pain में हो,
तो अपने दर्द को
किसी अपने से बाँटना।
जब किसी से प्यार हो,
तो कभी उसे
“अपनापन” कहकर देखना।
और जब बात देश की आए…
तो अपनी मातृभाषा पर शर्म नहीं,
गर्व करना!
मुझे सिर्फ 14 सितंबर को
याद मत करना।
उस दिन भाषण देकर
अगले दिन भूल मत जाना।
मैं सिर्फ 14 सितंबर की हिन्दी नहीं हूँ…
आपकी हँसी की हिन्दी हूँ,
आपके आँसुओं की हिन्दी हूँ,
आपके रिश्तों की हिन्दी हूँ,
आपके संस्कारों की हिन्दी हूँ…
और सबसे बढ़कर—
मैं भारत के हर दिन की हिन्दी हूँ!
TC
TTYL
माफ कीजिएगा...
अपना ध्यान रखना।
फिर मिलेंगे।
रचनाकार
राखी पलोड
स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन
जहानाबाद महिला प्रकोष्ठ (तेलंगाना)
प्रस्तुति









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