बाल गोपाल की मनोहारी झांकी में साकार हुआ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का उल्लास

मनोहारी झांकी से साकार हुआ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का उल्लास

‘उलझन सुलझन’ महिला लेखिका प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय संयोजिका श्रीमती विजया डालमिया ने और बेंगलुरु से स्थानीय संपादक श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी जी पूरे मनोयोग से सजाई कृष्ण-झांकी

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आनंद, उल्लास, वात्सल्य और बाल-सुलभ चंचलता को अनुभव करने का अवसर है। भगवान श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप अपने आप में ऐसी आत्मीयता समेटे है कि बच्चे हों या बड़े, हर कोई उनके प्रति सहज रूप से आकर्षित हो जाता है।

इसी भाव को आत्मसात करते हुए ‘उलझन सुलझन’ महिला लेखिका प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय संयोजिका श्रीमती विजया डालमिया ने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को पूरे मनोयोग, श्रद्धा और रचनात्मकता के साथ मनाया। इस अवसर पर उन्होंने अत्यंत सुंदर और मनोहारी बाल गोपाल की झांकी सजाई, जिसने पूरे वातावरण को कृष्णमय बना दिया।

झांकी में सुसज्जित बाल गोपाल को सुंदर पालने में विराजमान किया गया। मोरपंख, रंग-बिरंगे पुष्प, आकर्षक श्रृंगार, जगमगाती रोशनियाँ और पारंपरिक सजावटी तत्वों ने झांकी की सुंदरता में चार चाँद लगा दिए। बाल गोपाल के मनोहारी स्वरूप के चारों ओर सजे पुष्प उनके बाल-सुलभ सौंदर्य और वात्सल्य भाव को और अधिक उभार रहे थे।

झांकी के समक्ष विधिवत भोग एवं प्रसाद की भी सुंदर व्यवस्था की गई। विभिन्न पारंपरिक व्यंजनों, फलों और मिष्ठानों से सजी थाल इस बात की साक्षी बनी कि जन्माष्टमी केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण को अपने कर्मों के माध्यम से व्यक्त करने का पर्व भी है। दीप की लौ और रोशनी की चमक ने पूरे वातावरण को भक्तिभाव से भर दिया।

इस आयोजन की सबसे सुंदर अनुभूति बाल-मन के साथ कृष्ण को जोड़ने में दिखाई देती है। श्रीमती विजया डालमिया ने जिस आत्मीयता से बाल गोपाल की झांकी सजाई, उसमें एक ओर भारतीय संस्कृति और परंपरा के प्रति श्रद्धा दिखाई देती है तो दूसरी ओर बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की सहज कोशिश भी।

कृष्ण का बाल स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में आनंद के लिए बड़े अवसरों की नहीं, निर्मल मन की आवश्यकता होती है। नटखट कान्हा की मुस्कान, उनकी बाल-लीलाएँ और माखन-चोरी की कथाएँ आज भी बच्चों के मन में उतना ही कौतूहल और आनंद जगाती हैं, जितना सदियों पहले जगाती रही होंगी।

श्रीमती विजया डालमिया की यह कृष्ण-झांकी इसी जीवंत परंपरा की एक सुंदर अभिव्यक्ति बनी। यह आयोजन बताता है कि जब श्रद्धा में सृजनशीलता जुड़ती है और सृजन में वात्सल्य, तब कोई भी त्योहार केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं रह जाता, बल्कि वह परिवार और समाज की स्मृतियों में एक सुंदर अनुभव बनकर बस जाता है।

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के इस पावन अवसर पर सजी यह झांकी भक्ति, सौंदर्य, संस्कार और बाल-उल्लास का मनोहारी संगम रही।

झलकियाँ (चित्र परिचय के अनुसार) 

मनोहारी श्रृंगार से सजे बाल गोपाल की झांकी—श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की भक्ति और उल्लास का सुंदर दृश्य (ये नयनाभिराम वीडियो और फोटोज़ साभार - प्रमिला त्रिवेदी जी)। 











पुष्पों, दीपों और रोशनी से सजी कृष्ण-झांकी में बाल गोपाल का मनोहारी स्वरूप यह सब श्रीमती विजया डालमिया जी के सौजन्य से।



बाल-मन के साथ कृष्णोत्सव का आनंद—जन्माष्टमी के रंग में रँगे आत्मीय क्षण।















स्नेह, श्रद्धा और पूरे मनोयोग से सजाई गई श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की झांकी तो बालकों का इस अवसर पर उल्लास हर्षित कर गया।
सूचना स्रोत








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